प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए चुनावी जाहिरनामे में कुल 37 आकर्षक वादों को प्रमुखता से स्थान दिया गया था। इनमें क्रमांक 22 पर स्पष्ट रूप से दावा किया गया था कि “स्वच्छ व सुंदर घुग्घुस शहर बनावण्यात येईल”। चुनाव बीत चुका है, सत्ता स्थापित हो चुकी है और प्रशासनिक तंत्र भी सक्रिय है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस वादे की वास्तविक स्थिति को लेकर अब नागरिकों के बीच गंभीर प्रश्न खड़े होने लगे हैं।
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में आज भी अनेक परिवार संकरी गलियों, अव्यवस्थित बस्तियों और मूलभूत सुविधाओं के अभाव वाले क्षेत्रों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। शहर के कई हिस्सों में टाउन प्लानिंग का अभाव, अनियोजित निर्माण, जलनिकासी की समस्याएं, टूटी सड़कें और सफाई व्यवस्था की चुनौतियां साफ दिखाई देती हैं। ऐसे में “स्वच्छ और सुंदर शहर” का सपना अभी तक धरातल पर उतरता नजर नहीं आ रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनावी मंचों से विकास, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन एक वर्ष बीतने के बाद भी शहर के कई वार्डों की तस्वीर में अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि अब जनता चुनावी घोषणाओं और वास्तविक कार्यों के बीच के अंतर पर चर्चा करने लगी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर परिषद के पास शहर के समग्र विकास के लिए कोई स्पष्ट और दीर्घकालीन मास्टर प्लान है? यदि है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? नगर नियोजन, सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधाओं और रोजगार सृजन जैसे विषयों पर ठोस कार्यवाही का अभाव नागरिकों की चिंता बढ़ा रहा है।
वहीं दूसरी ओर नगर परिषद कार्यालय की कार्यप्रणाली भी चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, अभियंता और संबंधित विभागों की जिम्मेदारियां केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित हैं या वास्तव में जमीनी स्तर पर निगरानी और क्रियान्वयन भी हो रहा है, इस पर सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का आरोप है कि प्रशासनिक व्यवस्था कागजी योजनाओं और नियमों के दायरे में अधिक दिखाई देती है, जबकि वास्तविक समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
शासन के विभिन्न नियमों और नगर विकास संबंधी प्रावधानों के अनुसार स्थानीय निकायों की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों को स्वच्छ वातावरण, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और नियोजित विकास उपलब्ध कराना है। यदि चुनावी घोषणाओं में किए गए वादों के अनुरूप कार्य नहीं होते हैं, तो जवाबदेही तय होना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रोजगार का मुद्दा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। शहर के विकास, सफाई, आधारभूत सुविधाओं और सार्वजनिक परियोजनाओं के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं। लेकिन यदि विकास कार्यों की गति धीमी रहती है, तो रोजगार सृजन की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं। ऐसे में विकास और रोजगार दोनों मुद्दों पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
फिलहाल घुग्घुस की जनता सत्ता पक्ष के चुनावी वादों और वर्तमान जमीनी हकीकत के बीच तुलना कर रही है। “स्वच्छ व सुंदर घुग्घुस” का सपना कितना साकार हुआ है, इसका वास्तविक मूल्यांकन आने वाले वर्षों में और स्पष्ट होगा। लेकिन पहला वर्ष समाप्त होने के बाद यह प्रश्न अवश्य उठ रहा है कि क्या यह वादा ठोस योजना, पर्याप्त निधि और प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में केवल राजनीतिक घोषणा बनकर रह जाएगा?
अब निगाहें सत्ता पक्ष, नगर परिषद प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं। आने वाले वर्षों में किए गए कार्य ही तय करेंगे कि जनता के सामने रखा गया सपना विकास की वास्तविक कहानी बनेगा या फिर चुनावी इतिहास का एक और अधूरा वादा साबित होगा।




