प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर: चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले जाहिरनामों में विकास के बड़े-बड़े दावे और आकर्षक वादे किए जाते हैं। इन्हीं वादों में सत्ता पक्ष के जाहिरनामे का एक महत्वपूर्ण मुद्दा था – “शहरातील युवक व युवतीनसाठी सैन्य व पोलीस भरतीसाठी पूर्व प्रशिक्षणाची व्यवस्था केली जाईल.” यानी शहर के युवक-युवतियों के लिए सैन्य और पुलिस भर्ती पूर्व प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
चुनाव को छह महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत में ऐसा कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा है। सवाल यह है कि यह वादा युवाओं के भविष्य को संवारने के लिए किया गया था या फिर केवल वोट हासिल करने का एक चुनावी हथकंडा था?
घुग्घूस केवल एक औद्योगिक शहर ही नहीं बल्कि प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और युवाओं का भी केंद्र माना जाता है। यहां के अनेक युवा सिविल सर्विसेज, सेना, पुलिस, नेवी और अन्य सरकारी सेवाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। आज भी कई छात्र-छात्राएं सुबह-शाम WCL मैदान और मुख्य सड़कों के किनारे भर्ती की तैयारी करते दिखाई देते हैं। लेकिन उन्हें गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, खेल सुविधाएं और कोचिंग के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है।
विडंबना यह है कि वर्षों से फिटनेस, खेल और युवा विकास के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन उन खर्चों का वास्तविक लाभ युवाओं तक पहुंचा या नहीं, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। क्या अब तक हुए खर्चों और योजनाओं की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर सारी फाइलें सरकारी अलमारियों में धूल खाती रहेंगी?
सबसे बड़ा प्रश्न नगर परिषद की टाउन प्लानिंग और विकास नीति पर भी खड़ा हो रहा है। आखिर शहर में मौजूद ओपन स्पेस, खेल मैदान और सार्वजनिक भूमि का सही नियोजन क्यों नहीं हुआ? यदि नगर परिषद और प्रशासन की दूरदर्शी योजना होती तो आज युवाओं को सैन्य और पुलिस भर्ती की तैयारी के लिए बुनियादी सुविधाओं के लिए भटकना नहीं पड़ता।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नगर परिषद कार्यालय में बैठे मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और अन्य जिम्मेदार अधिकारी आखिर जनविकास की कौन सी योजना पर काम कर रहे हैं? क्या उनकी भूमिका केवल एसी केबिन और कागजी फाइलों तक सीमित रह गई है? क्योंकि जमीनी स्तर पर विकास की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
चुनावी वादे करने वालों ने युवाओं को बड़े सपने दिखाए थे। लेकिन छह महीने बाद भी सैन्य और पुलिस भर्ती पूर्व प्रशिक्षण केंद्र की कोई स्पष्ट योजना, जमीन, फंड या निर्माण कार्य दिखाई नहीं देता। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ता पक्ष का यह वादा भी अन्य अधूरे वादों की तरह केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा?
घुग्घूस ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों के युवाओं और अभिभावकों की नजर अब इस मुद्दे पर टिकी हुई है। जनता जानना चाहती है कि आखिर वादा नंबर 25 की प्रगति क्या है? कितनी जमीन चिन्हित हुई? कितना फंड मंजूर हुआ? कौन सी कार्ययोजना बनाई गई? और कब तक युवाओं को इसका लाभ मिलेगा?
फिलहाल हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि योजना, जमीन और वित्तीय संसाधनों के अभाव में यह महत्वाकांक्षी वादा ऑक्सीजन पर नजर आ रहा है। अब आने वाला समय तय करेगा कि जनता के सवाल सही थे या राजनीति के दावे। क्योंकि पांच साल का कार्यकाल केवल भाषणों और जाहिरनामों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले कामों से तय होता है।
युवाओं को इंतजार है जवाब का, और जनता देख रही है कि वादा नंबर 25 आखिर हकीकत बनता है या एक और चुनावी सपना साबित होता है।




