प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगर परिषद में ठेका पद्धति के तहत कार्यरत मजदूरों को समय पर वेतन भुगतान न होने के आरोपों ने प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। क्षेत्र में चर्चा का विषय यह बन गया है कि आखिर इस मामले में “प्रिंसिपल अकाउंटेबिलिटी” (मुख्य जवाबदेही) किसकी है—ठेकेदार की या संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की?
मजदूरों का आरोप है कि वे नियमित रूप से कार्य करने के बावजूद समय पर वेतन से वंचित हैं। उनका कहना है कि ठेकेदारों द्वारा लगातार लापरवाही बरती जाती है, जिससे उनके परिवारों के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो रहा है। कई मजदूर इसे श्रम अधिकारों और मानवीय गरिमा के साथ खिलवाड़ तक मान रहे हैं।
दूसरी ओर, सूत्रों के अनुसार नगर परिषद प्रशासन भी इस गंभीर विषय पर अपेक्षित सख्ती दिखाता नजर नहीं आ रहा है। सवाल यह है कि यदि ठेका पद्धति के अंतर्गत श्रमिकों का शोषण या वेतन भुगतान में अनियमितता हो रही है, तो उसकी निगरानी करने वाले अधिकारी आखिर क्या कर रहे हैं? क्या केवल ठेकेदार को दोषी ठहराकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय का अभाव दिखाई दे रहा है। विकास कार्यों से लेकर श्रमिकों की समस्याओं तक कई मामलों में एकजुट और प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आने से आम नागरिकों में असंतोष बढ़ रहा है। इसका सीधा खामियाजा मजदूरों और जनता को भुगतना पड़ रहा है।
प्रशासनिक नियमों के जानकारों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के संज्ञान में शिकायत आने के बावजूद वह कार्रवाई नहीं करता, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच, कारण बताओ नोटिस, सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई अथवा उच्च अधिकारियों द्वारा जवाबदेही तय की जा सकती है। ऐसे मामलों में कार्रवाई केवल शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए निवेदन, ज्ञापन, अर्ज या आवेदन (एप्लिकेशन) के आधार पर ही नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारी स्वयं संज्ञान लेकर भी शुरू कर सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मजदूरों की शिकायतों पर नगर परिषद प्रशासन स्वतः सक्रिय होगा या फिर पीड़ितों को बार-बार आवेदन देकर न्याय की गुहार लगानी पड़ेगी? यदि शिकायतें वर्षों से सामने आ रही हैं, तो अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
घुग्घुस में मजदूरों के वेतन भुगतान का मुद्दा अब केवल भुगतान का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, श्रमिक अधिकारों और शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है। जनता की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहेगी या वास्तव में जिम्मेदार ठेकेदारों और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएंगे।
फिलहाल, घुग्घुस में एक ही सवाल गूंज रहा है—जब मजदूरों का वेतन अटकता है, तो जवाबदेही किसकी तय होगी: ठेकेदार की, अधिकारी की या फिर दोनों की?




