प्रणयकुमार बंडी
चंद्रपुर जिले के घुग्घुस, वेकोली वणी क्षेत्र की कामगार वसाहतों की हालत आज गंभीर सवाल खड़े कर रही है। कभी श्रमिक परिवारों के लिए बनाई गई ये बस्तियां—गांधीनगर, सुभाष नगर, इंदिरा नगर, शास्त्री नगर और रामनगर—अब बदहाली और उपेक्षा की प्रतीक बन चुकी हैं। सवाल सीधा है: इस जर्जर हालत का जिम्मेदार कौन है—कंपनी प्रबंधन, ठेकेदार या प्रशासन?
निजीकरण की प्रक्रिया के बाद से कंपनी प्रबंधन की प्राथमिकताओं में इन वसाहतों का स्थान जैसे खत्म हो गया है। मेंटेनेंस, नाली सफाई, जल प्रबंधन जैसे बुनियादी कार्य कागजों तक सीमित नजर आते हैं। ठेकेदारों को हर साल लाखों रुपये के कार्य सौंपे जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है।
क्षेत्र में नालियां टूटी पड़ी हैं, जगह-जगह जाम की स्थिति बनी हुई है। कचरा कुंडलियों की सफाई नहीं होने से गंदगी का अंबार लगा है। कॉलोनियों में कूड़े के ढेर आम दृश्य बन चुके हैं। पानी की नई टंकियों का कोई अता-पता नहीं, पुरानी वाटर स्टोरेज टंकियां गंदगी, फंगस और झाड़ियों से घिरी पड़ी हैं। हालात ऐसे हैं कि ये वसाहतें अब रहने लायक नहीं, बल्कि खंडहर जैसी प्रतीत होती हैं।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। क्या जिलाधिकारी इस ओर ध्यान देंगे? क्या तहसील विभाग कार्रवाई करेगा? क्या नगर परिषद अपनी जिम्मेदारी निभाएगी? या फिर यूनियन और पुलिस प्रशासन इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएंगे? या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
कानूनी दृष्टि से देखें तो कामगारों को सुरक्षित और स्वच्छ आवास उपलब्ध कराना कंपनी की जिम्मेदारी है। यदि मेंटेनेंस के नाम पर फंड खर्च हो रहा है, तो उसकी पारदर्शिता और ऑडिट होना आवश्यक है। अन्यथा यह मामला भ्रष्टाचार और लापरवाही का गंभीर उदाहरण बन सकता है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई देने लगी है। स्थानीय नेताओं के लिए यह एक बड़ा जनसरोकार का विषय बन सकता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह जनआक्रोश का रूप ले सकता है।
अब देखना यह है कि प्रशासन और कंपनी प्रबंधन इस गंभीर स्थिति पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, या फिर कामगार परिवार यूं ही बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर रहेंगे?




