(प्रणयकुमार बंडी)
यवतमाल जिला के वणी तालुका के मुंगोली-शिवनी क्षेत्र से एक चौंकाने वाला मामला सामने आ रहा है, जहां आम जनता को सुनियोजित तरीके से ठगा जा रहा है। आरोप है कि पिछले 3-4 वर्षों से “WCL में नौकरी दिलाने” का झांसा देकर छोटे-छोटे कमरे बनाकर बेचे जा रहे हैं, जिससे न सिर्फ गरीब और मध्यम वर्ग के लोग फंस रहे हैं, बल्कि शासन को भी करोड़ों का चुना लगाया जा रहा है।
यह कथित स्कैम केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। घुग्घुस, नकोडा, चंद्रपुर, वणी, मुंगोली, कैलाशनगर और उसगांव जैसे कई इलाकों में लोगों को “भविष्य में नौकरी और स्थायी बसावट” का लालच देकर इस अवैध कारोबार में धकेला जा रहा है।
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा तेज
सबसे गंभीर बात यह है कि इस पूरे खेल में स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण की भी चर्चा जोरों पर है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ विधायक और मंत्रियों के सक्रिय कार्यकर्ता इस अवैध धंधे में शामिल हैं। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह नेटवर्क बेखौफ चल रहा है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रशासनिक तंत्र पर भी उठे सवाल
इस मामले में गांव स्तर से लेकर जिला स्तर तक की भूमिका संदेह के घेरे में है। ग्रामपंचायत सचिव, सरपंच, सदस्य, पुलिस पाटिल, पंचायत समिति और जिला परिषद के प्रतिनिधि, WCL अधिकारी, स्थानीय पुलिस इन सभी की निष्क्रियता या संभावित मिलीभगत पर सवाल उठ रहे हैं। क्या इतने बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण और जमीन का लेन-देन बिना प्रशासन की जानकारी के संभव है?
कलेक्टर और तहसीलदार पर भी उंगली
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यवतमाल के कलेक्टर को इस पूरे मामले की जानकारी नहीं है, या फिर वणी तालुका के तहसीलदार की यह घोर लापरवाही है? यदि जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी।
कानूनी और वित्तीय पहलू भी गंभीर
यह मामला केवल जमीन और निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई कानूनी पहलू जुड़े हैं: भूमि अभिलेख (Land Records) में गड़बड़ी, अवैध निर्माण और प्लॉटिंग, आयकर (Income Tax) से जुड़ी संभावित चोरी, नियमों का उल्लंघन. सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या इस अवैध कमाई पर टैक्स दिया जा रहा है? और अगर नहीं, तो आयकर विभाग अब तक खामोश क्यों है?
जनसंख्या और दस्तावेजों में हेरफेर का शक
गांव में जितने घर बनाए गए हैं, क्या उतने लोग वास्तव में वहां रहते हैं? या फिर यह केवल कागजों पर दिखाकर किसी बड़े घोटाले की नींव रखी जा रही है? यह भी जांच का विषय है।
जिम्मेदार कौन?
इस पूरे कथित घोटाले में जिम्मेदारी तय करना सबसे बड़ा सवाल है: क्या सरपंच और ग्राम सचिव जिम्मेदार हैं? या फिर तहसील और जिला प्रशासन? या राजनीतिक संरक्षण के बिना यह संभव ही नहीं?
अब कार्रवाई का इंतजार
अब नजरें शासन-प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस मामले में सख्त और निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
अगर समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह “जमीन-निर्माण माफिया” पूरे क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना को गहरे संकट में डाल सकता है।




