(प्रणयकुमार बंडी)
Election Commission of India के तहत चल रही SIR (विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण) प्रक्रिया में 100% घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। प्रशासन इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की पहल बता रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस अभियान को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जिला प्रशासन द्वारा BLO अधिकारियों के संपर्क नंबर चौक-चौराहों पर लगाए गए हैं, और अधिकारी फोन के माध्यम से लोगों से संपर्क कर घर-घर पहुंच रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है—क्या हर नागरिक इस प्रक्रिया को समझ पा रहा है?
ग्रामीण और अशिक्षित वर्ग के कई लोग अब भी इस प्रक्रिया से अनजान हैं। कई जगहों से यह शिकायत सामने आ रही है कि बिना पूरी जानकारी दिए दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जिससे आम नागरिकों में भ्रम और भय का माहौल बन रहा है। फोन कॉल और अचानक घर पहुंचने वाले अधिकारी लोगों को असहज कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया पारदर्शी और जनहितकारी होनी चाहिए, न कि डर और दबाव का कारण। यदि लोगों को सही जानकारी ही नहीं दी जाएगी, तो यह पहल अपने उद्देश्य से भटक सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों को पढ़ना-लिखना नहीं आता या जो प्रशासनिक प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ हैं, उनके लिए सरकार की क्या व्यवस्था है? क्या सिर्फ कागजी प्रक्रिया पूरी करना ही लक्ष्य है, या वास्तव में हर नागरिक को जागरूक बनाना?
यदि प्रशासन ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह पहल जनसहभागिता के बजाय अविश्वास को जन्म दे सकती है। लोकतंत्र में भागीदारी जरूरी है, लेकिन वह समझ और विश्वास के साथ होनी चाहिए—न कि उलझन और दबाव में।




