(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस नगर परिषद के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अब शहर के हर नुक्कड़-चौराहे पर एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या यह परिषद जनता के जनादेश के अनुसार चलेगी, या फिर सत्ता-समीकरण और राजनीतिक जोड़-तोड़ का अखाड़ा बनेगी?
नगर परिषद की संरचना में कुल 22 पार्षद चुने गए हैं। इनमें 11 पार्षद कांग्रेस, 7 पार्षद भाजपा, 2 पार्षद घड़ी पार्टी और 2 पार्षद अन्य/पक्ष से जुड़े बताए जा रहे हैं। संख्या के हिसाब से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन स्पष्ट बहुमत के बावजूद स्थिरता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। वजह साफ है—पिछले अनुभव और मौजूदा राजनीतिक संकेत।
पदों की होड़ या जनसेवा की जिम्मेदारी?
अध्यक्ष पद जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुना गया है, लेकिन इसके बाद का पूरा खेल परिषद के भीतर शुरू होता है। उपाध्यक्ष, वित्त समिति, स्वास्थ्य समिति, शिक्षा समिति जैसे अहम पद पार्षदों के बीच से चुने जाते हैं। यही वे पद हैं, जिनसे न केवल प्रशासनिक पकड़ बनती है, बल्कि राजनीतिक भविष्य भी तय होता है।
सवाल यह है कि— क्या ये पद योग्यता, अनुभव और जनसेवा के आधार पर मिलेंगे? या फिर पार्टी बदल, समर्थन देने और सत्ता संतुलन साधने की रणनीति के तहत?
भाजपा की रणनीति पर अटकलें
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा अपने भविष्य को मजबूत करने के लिए परिषद के भीतर पार्षदों को विश्वास में लेकर पार्टी में प्रवेश करवाने की कोशिश करेगी? क्या अध्यक्ष और अन्य सदस्यों पर दबाव या प्रलोभन की राजनीति चलेगी? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि अतीत में स्थानीय निकायों में ऐसे प्रयोग देखे जा चुके हैं।
मेहनत बनाम जोड़–तोड़
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि आखिर किन्हें स्वीकृत पद मिलेंगे— वह उम्मीदवार जिसने सबसे अधिक वोट लेकर दूसरा स्थान हासिल किया, जैसे शारदा उर्फ पूजा दुर्गम (भाजपा)? या वे कार्यकर्ता जिन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन पर्दे के पीछे कांग्रेस या भाजपा को मजबूती दी? या फिर वे समाजसेवक, पत्रकार और जमीनी कार्यकर्ता जिन्होंने सरपंच, उपसरपंच, ग्रामपंचायत सदस्य या शहर अध्यक्ष जैसे दिग्गजों के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस दिखाया?
यदि इन सभी को दरकिनार कर केवल संख्याबल और सौदेबाज़ी के आधार पर पद बांटे गए, तो यह सीधे-सीधे जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ होगा।
“बोली” की राजनीति—सवाल, आरोप नहीं
शहर में यह चर्चा भी है कि क्या इन पदों के लिए किसी तरह की बोली लग सकती है? हालांकि यह आरोप नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठता एक गंभीर सवाल है। यदि पार्षदों का समर्थन जनहित की जगह निजी लाभ से तय होने लगे, तो नगर परिषद एक सेवा संस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक मंडी बनकर रह जाएगी।
घुग्घुस की जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनते वक्त विकास, पारदर्शिता और ईमानदार नेतृत्व की उम्मीद की है। अब जिम्मेदारी पार्षदों और राजनीतिक दलों पर है कि वे साबित करें – नगर परिषद जनादेश से चलेगी, न कि जोड़-तोड़ से। पद सेवा के लिए होंगे, सौदेबाज़ी के लिए नहीं।
यदि इस कसौटी पर परिषद असफल रही, तो यह सिर्फ किसी पार्टी की हार नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र और जनता के विश्वास की हार मानी जाएगी।




