नई दिल्ली : दिल्ली में भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने आज कांग्रेस और महागठबंधन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि “नीतीश कुमार को भी अब कट्टे के दम पर मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर अपने नाम की घोषणा करवा लेनी चाहिए” — कांग्रेस के इस कथित बयान से तीन निष्कर्ष निकलते हैं: पहला, कि कांग्रेस ने नीतीश कुमार की जीत स्वीकार कर ली है; दूसरा, कि महागठबंधन के पास विकास का कोई मुद्दा नहीं बचा; और तीसरा, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “कट्टा” वाला बयान अब सत्य सिद्ध हो गया है।
लेकिन, त्रिवेदी का यह बयान खुद भाजपा की विचारहीन राजनीति और भाषाई गिरावट का प्रतीक बन गया है। जिस दौर में जनता बेरोज़गारी, महंगाई, पलायन और उद्योगों के पतन से जूझ रही है, उस समय देश की सबसे बड़ी सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता का पूरा जोर ‘कट्टा’ और ‘कनपटी’ जैसे शब्दों पर है। यह न केवल राजनीतिक विमर्श को दूषित करता है, बल्कि जन-चर्चा को भी अपराधी भाषा की ओर धकेलता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस चुनाव में मुद्दों की जगह जुमलों पर उतर आई हैं। भाजपा प्रवक्ता का यह बयान बताता है कि सत्तारूढ़ दल विपक्ष के कथनों की व्याख्या में ही अपनी ऊर्जा लगा रहा है, जबकि जनता यह जानना चाहती है कि बिहार और देश के भविष्य के लिए ठोस योजनाएं क्या हैं।
विरोधियों पर आरोप लगाना राजनीति का हिस्सा है, परंतु जब पूरा विमर्श “कट्टे के दम पर” घूमने लगे, तो यह लोकतंत्र के स्तर पर एक खतरनाक संकेत है। त्रिवेदी जैसे वरिष्ठ नेताओं को याद रखना चाहिए कि संसद में शब्दों का वजन गोली से ज्यादा होता है — और लोकतंत्र में बहस का हथियार हमेशा विचार होना चाहिए, हथियार नहीं।
सुधांशु त्रिवेदी का बयान विपक्ष पर हमला जरूर है, लेकिन इससे ज्यादा यह भाजपा की उस मनोवैज्ञानिक घबराहट को उजागर करता है, जिसमें राजनीतिक तर्क कमजोर पड़ने पर ‘कट्टा’ जैसे रूपकों का सहारा लिया जाता है। जनता ने अब तक ऐसे जुमलों को सुनने की आदत डाल ली है — लेकिन शायद इस बार, वह जवाब मतपेटी की गोलियों से नहीं, मतों की ताकत से देगी।




