भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा केवल बड़े नेताओं और आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उन क्रांतिकारियों का भी अमूल्य योगदान है जिन्होंने अपने जीवन का हर क्षण देश को अंग्रेज़ी हुकूमत से मुक्त कराने में समर्पित किया। आज हम ऐसे ही एक निर्भीक क्रांतिकारी पुलिन बिहारी दास (Pulin Behari Das) के बारे में बात करेंगे।
प्रारंभिक जीवन
पुलिन बिहारी दास का जन्म 24 जनवरी 1877 को बांग्ला प्रांत (आज का बांग्लादेश) में हुआ था। उनका परिवार सामान्य था, लेकिन बचपन से ही उनमें अदम्य साहस और न्यायप्रियता दिखाई देती थी। शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अध्यापक के रूप में भी कार्य किया।
क्रांतिकारी गतिविधियाँ
1905 में जब बंगाल विभाजन हुआ तो पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसी समय पुलिन बिहारी दास ने युवाओं को संगठित करना शुरू किया।
उन्होंने ढाका में “अनुशीलन समिति” (Dhaka Anushilan Samiti) की स्थापना की, जो क्रांतिकारी युवाओं का एक सशक्त संगठन था।
इस समिति ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाई शुरू की और अनेक युवाओं को हथियारों की ट्रेनिंग दी।
पुलिन बिहारी दास का मानना था कि केवल आंदोलन या निवेदन से आज़ादी नहीं मिलेगी, इसके लिए युवाओं को शक्ति और संगठन की आवश्यकता है।
ब्रिटिश सरकार की नज़र में
उनकी गतिविधियों से अंग्रेज़ सरकार बेहद भयभीत थी। उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल में कठोर यातनाएँ दी गईं। बावजूद इसके उन्होंने अपने आदर्शों और स्वतंत्रता संग्राम की राह कभी नहीं छोड़ी।
योगदान और विरासत
पुलिन बिहारी दास ने बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी।
उन्होंने युवाओं में आत्मबल और देशप्रेम की लौ जगाई।
उनका संगठन अनुशीलन समिति बाद में अनेक बड़े क्रांतिकारी आंदोलनों की प्रेरणा बना।
पुलिन बिहारी दास का नाम शायद इतिहास की मुख्य धारा में उतना प्रसिद्ध न हो, लेकिन भारत की आज़ादी की नींव मजबूत करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि संगठित युवाशक्ति और दृढ़ निश्चय किसी भी बड़ी ताकत को चुनौती दे सकता है।





