Tuesday, June 9, 2026

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घुग्घुस भू-स्खलनग्रस्तांना न्यायाचा प्रश्न अजूनही अनुत्तरित; तीन वर्षांनंतरही घर-जमीन व पट्ट्यांचा दिलासा नाही

घुग्घुस भूस्खलन पीड़ितों को अब तक न्याय क्यों नहीं?

(प्रणयकुमार बंडी)

चंद्रपुर (महाराष्ट्र) – केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में फडणवीस सरकार होने के बावजूद घुग्घुस भूस्खलन पीड़ितों को अब तक मकान, जमीन और पट्टे नहीं मिले हैं। यह सवाल स्थानीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया है। जनता और कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि यह मामला संवेदनशील है या फिर सिर्फ राजनीतिक जुमला और वर्चस्व की राजनीति।

26 अगस्त 2022 : भूस्खलन की दर्दनाक घटना

तीन साल पहले “पोला उत्सव” के दिन घुग्घुस के अमराई वार्ड में भूस्खलन हुआ था। इस हादसे में पूरा घर जमीन में धंस गया था, जबकि कई मकान खतरे की स्थिति में आ गए थे। उस समय प्रशासन ने 169 परिवारों को अन्यत्र स्थानांतरित किया था। लेकिन तीन साल बाद भी इन परिवारों को स्थायी आवास, जमीन और पट्टे नहीं दिए गए।

सत्ता पक्ष के नेता निशाने पर

चंद्रपुर जिले के वर्तमान और पूर्व पालक मंत्री राज्य व केंद्र की सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हैं। इनमें से एक “विकास पुरुष” तो दूसरे को “आदिवासी नेता” कहा जाता है। इनके समर्थक इन्हें शीर्ष पर स्थापित करने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन पीड़ितों की मदद के नाम पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। प्रशासन सिर्फ जानकारी लेने और श्रेय लेने में आगे दिख रहा है।

विपक्ष की भूमिका भी संदिग्ध

घुग्घुस में कांग्रेस, बीएसपी, शिवसेना (उद्धव गट), शिवसेना (शिंदे गट), आरपीआई, एनसीपी, एनसीपी (एसपी), आप, बीआरएसपी, एमएनएस और एआईएमआईएम जैसी कई पार्टियां सक्रिय हैं। लेकिन इन दलों ने भी इस मुद्दे पर गंभीरता से संघर्ष नहीं किया। स्थानीय लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि कहीं कुछ विपक्षी नेता सत्ता पक्ष से जुड़े तो नहीं हैं, जिसके कारण 169 परिवार अब तक न्याय से वंचित हैं।

वेस्टर्न कोलफील्ड की जमीन और अतिक्रमण

भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र वेस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की जमीन पर बसा है। गरीब और भूमिहीन लोगों ने यहां वर्षों पहले अस्थायी घर बनाए थे। लेकिन अब नेताओं, दबंगों और प्रभावशाली लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया जा रहा है। ऐसे में वास्तविक पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और मदद नहीं मिल पा रही है।

प्रशासन की चुप्पी और बढ़ता खतरा

आज भी कई परिवार खतरनाक घरों में रहने को मजबूर हैं। अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। सवाल यह है कि यदि भविष्य में कोई और दुर्घटना होती है तो जिम्मेदार कौन होगा—सरकारी अधिकारी या मजबूरी में वहां रहने वाले पीड़ित परिवार?

घुग्घुस भूस्खलन पीड़ितों का मामला सिर्फ पुनर्वास का नहीं, बल्कि राजनीतिक उदासीनता और सत्ता संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। जनता अब यह पूछ रही है कि क्या इन परिवारों को न्याय मिलेगा या यह मुद्दा हमेशा की तरह नेताओं के वादों और राजनीतिक खेल में दबा दिया जाएगा।

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