प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर: चुनाव के समय जनता के सामने बड़े-बड़े वादे करना भारतीय राजनीति की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी चुनाव जीतने के बाद उन वादों को धरातल पर उतारने में होती है। वर्ष 2025 के नगर परिषद चुनाव में सत्ता पक्ष ने अपने घोषणा-पत्र (जाहिरनामा) में कुल 37 आकर्षक वादे किए थे। इनमें क्रमांक-27 पर यह घोषणा की गई थी कि “शहरातील सर्वधर्मीय (हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चन) स्मशानभूमीला दरवर्षी देखभाल व दुरुस्तीकरिता विशेष निधी अनुदान देण्यात येईल.”
चुनाव संपन्न हुए लगभग छह महीने बीत चुके हैं। अब जनता यह जानना चाहती है कि इस घोषणा पर अब तक कितना अमल हुआ? क्या नगर परिषद ने किसी विशेष निधि का प्रावधान किया? क्या किसी श्मशान या कब्रिस्तान में रखरखाव एवं मरम्मत के लिए ठोस कार्य शुरू हुए? या यह वादा भी केवल चुनावी दस्तावेज तक ही सीमित रह गया?
घुग्घूस नगर परिषद क्षेत्र एक औद्योगिक शहर होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों को लेकर लगातार सवालों के घेरे में रहा है। ऐसे में सर्वधर्मीय श्मशानभूमियों के विकास और रखरखाव जैसे संवेदनशील विषय पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि चुनाव के दौरान किए गए वादों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती, तो जनता का विश्वास टूटना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में घोषणा-पत्र केवल वोट मांगने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक सार्वजनिक संकल्प और जवाबदेही का दस्तावेज होता है।
नगर परिषद कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का आरोप है कि मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, अभियंता और संबंधित अधिकारी फाइलों और बैठकों तक सीमित दिखाई दे रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर अपेक्षित विकास कार्य नजर नहीं आ रहे। शहर की योजना, विकास और निधियों के पारदर्शी उपयोग को लेकर भी आम जनता उत्तर चाहती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि घोषणा-पत्र में सर्वधर्मीय श्मशानभूमियों के लिए हर वर्ष विशेष निधि देने का वादा किया गया था, तो उसकी प्रशासनिक प्रक्रिया कहां तक पहुंची? यदि कार्य शुरू हो चुका है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और यदि काम शुरू नहीं हुआ, तो देरी का कारण क्या है?
आज आवश्यकता केवल राजनीतिक भाषणों की नहीं, बल्कि जमीनी कार्यों की है। जनता अब विकास को कागजों में नहीं, बल्कि वास्तविकता में देखना चाहती है। चुनावी वादों की सफलता का प्रमाण भाषणों से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से मिलेगा।
अब समय सत्ता पक्ष के लिए आत्ममंथन का है। जनता की अदालत में सबसे बड़ा फैसला चुनाव नहीं, बल्कि वादों की पूर्ति तय करती है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि घोषणा-पत्र का 27वां वादा विकास की मिसाल बनेगा या फिर राजनीति के अधूरे वादों की सूची में शामिल हो जाएगा।
यदि इस विषय पर नगर परिषद प्रशासन, जनप्रतिनिधियों या संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।




