Saturday, May 30, 2026

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शासकीय शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार का दावा, लेकिन जमीनी हकीकत क्या?

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दल जनता के सामने विकास, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई आकर्षक वादे रखते हैं। इन्हीं वादों के आधार पर मतदाता अपना जनादेश देते हैं और उम्मीद करते हैं कि चुनावी घोषणा-पत्र में किए गए आश्वासन धरातल पर दिखाई देंगे। नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए 37 सूत्रीय जाहिरनामे में 14वां मुद्दा था — “शासकीय शैक्षणिक गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देकर शिक्षा के स्तर में सुधार किया जाएगा।”

चुनाव को 5 महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब यह सवाल उठने लगा है कि इस वादे को अमलीजामा पहनाने के लिए आखिर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में रहने वाले अनेक परिवार आज भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर हैं। इनमें बड़ी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों की है, जिनके लिए सरकारी विद्यालय ही बेहतर भविष्य का एकमात्र सहारा हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के दावे तो किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे हैं। स्कूलों में उपलब्ध संसाधन, शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों के लिए सुविधाएं तथा गुणवत्ता आधारित शिक्षण व्यवस्था को लेकर कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं शिक्षा सुधार का वादा भी केवल चुनावी भाषणों और घोषणाओं तक सीमित तो नहीं रह गया।

नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। टाउन प्लानिंग, जनविकास और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपेक्षित प्रगति दिखाई नहीं देने से नागरिकों के बीच असंतोष बढ़ रहा है। लोगों का मानना है कि यदि शिक्षा को वास्तव में प्राथमिकता दी गई होती, तो उसके सकारात्मक परिणाम अब तक सामने आने चाहिए थे। इसके विपरीत, कई क्षेत्रों में स्थिति जस की तस दिखाई देती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकार या सत्तापक्ष की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन से मापी जाती है। यदि शिक्षा जैसे मूलभूत विषय पर किए गए वादों की प्रगति जनता को दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से जनता का विश्वास कमजोर होता है। यही कारण है कि अब नागरिक पूछ रहे हैं कि शिक्षा सुधार का रोडमैप क्या है, कितना निधि उपलब्ध कराया गया, कौन-कौन सी योजनाएं लागू हुईं और उनका लाभ विद्यार्थियों तक कितना पहुंचा?

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी आम है कि कहीं योजनाएं परफेक्ट प्लानिंग और पर्याप्त फंड के अभाव में फाइलों तक ही सीमित तो नहीं हैं। यदि ऐसा है, तो इसकी जवाबदेही तय होना भी आवश्यक है। जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहिए। आखिर सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का वादा किस स्तर तक सफल हुआ है, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है।

फिलहाल जाहिरनामे के 14वें वादे की वास्तविक परीक्षा जारी है। पहले वर्ष के कार्यकाल में इस दिशा में कितनी उपलब्धि हासिल हुई, इसका आकलन आने वाले समय में और स्पष्ट होगा। लेकिन एक बात तय है कि अगले चार वर्षों में सत्ता पक्ष की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि शिक्षा सहित अन्य वादों पर किए गए वास्तविक कार्यों से होगी।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जनता की शंकाएं सही साबित होती हैं या फिर सत्ता पक्ष अपने वादों को धरातल पर उतारकर भरोसा कायम करने में सफल होता है। आने वाला समय ही तय करेगा कि जीत के समय किए गए वादे राजनीतिक दस्तावेज थे या विकास का वास्तविक संकल्प।

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Pranaykumar Bandi

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