प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादे लोकतंत्र की बुनियाद माने जाते हैं। इन्हीं वादों के आधार पर मतदाता अपना विश्वास किसी राजनीतिक दल और उसके उम्मीदवारों पर जताते हैं। नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान जारी किए गए एक चर्चित जाहिरनामे में 37 आकर्षक मुद्दे शामिल किए गए थे। इनमें 13वें क्रमांक पर “दिव्यांग बांधवांसाठी स्वयंरोजगाराची निर्मिती केल्या जाईल” अर्थात दिव्यांग नागरिकों के लिए स्वयंरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का वादा किया गया था। अब इस वादे की जमीनी हकीकत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में रहने वाले अनेक दिव्यांग नागरिक आज भी रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें कई युवा उच्च शिक्षित हैं। किसी ने 10वीं, 12वीं, स्नातक, परास्नातक तथा अन्य व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की है, तो कुछ अशिक्षित होने के बावजूद मेहनत कर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर ये परिवार आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि चुनावी मंचों से किए गए वादे कभी न कभी वास्तविकता में बदलेंगे।
कई दिव्यांग युवाओं ने क्षेत्र की विस्ताराधीन कंपनियों में अपने बायोडाटा जमा किए हैं। वे राजनीतिक सिफारिशों के बजाय अपनी योग्यता के आधार पर रोजगार प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन रोजगार के अवसर अब तक उनके हाथ नहीं लगे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वयंरोजगार और रोजगार सृजन के दावे आखिर किस स्तर तक पहुंचे हैं?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनावी घोषणाएं जनता को आकर्षित करने के लिए तो की जाती हैं, लेकिन बाद में उन पर अमल की गति बेहद धीमी दिखाई देती है। जरूरतमंद परिवारों का सपना कहीं केवल चुनावी वादों तक सीमित न रह जाए, इसे लेकर चर्चा आम होती जा रही है। अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि सत्ता पक्ष अपने वादों को पूरा करने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।
वहीं नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। आम नागरिकों का आरोप है कि विकास योजनाओं और जनहित के मुद्दों पर अपेक्षित गति दिखाई नहीं देती। कार्यालयों में फाइलों का बोझ बढ़ता है, लेकिन जमीनी स्तर पर परिणाम कम दिखाई देते हैं। छोटे कर्मचारियों से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक अक्सर उच्च अधिकारियों का हवाला दिया जाता है, जिससे नागरिकों की समस्याएं समाधान के बजाय प्रक्रियाओं में उलझती नजर आती हैं।
टाउन प्लानिंग, जनविकास और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दों पर प्रशासन की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो रही है। नागरिकों का मानना है कि यदि योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाए और उपलब्ध निधियों का प्रभावी उपयोग हो, तो स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वयंरोजगार के कई अवसर पैदा किए जा सकते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति में योजनाओं और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जाहिरनामे का 13वां वादा आखिर कितना सफल रहा? दिव्यांग नागरिकों को स्वयंरोजगार उपलब्ध कराने के लिए कौन-कौन सी योजनाएं लागू की गईं, कितने लाभार्थियों को फायदा मिला और कितने लोग अब भी प्रतीक्षा में हैं, इसका स्पष्ट जवाब जनता जानना चाहती है।
फिलहाल घुग्घुस की जनता वादों और वास्तविकता के बीच का अंतर देख रही है। चुनावी घोषणाओं की सफलता का आकलन भाषणों से नहीं, बल्कि जमीनी परिणामों से होगा। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि जनता की शंकाएं सही थीं या फिर राजनीति अपने वादों पर खरी उतरी। सत्ता पक्ष के लिए यह केवल एक चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि उसकी कार्यशैली, जवाबदेही और जनविश्वास की वास्तविक परीक्षा है।




