प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर: नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने के तीन माह बाद भी शहर में विकास कार्यों की रफ्तार ठप रहने से प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में दिनांक 31 मार्च 2026, मंगलवार को महावीर जयंती के अवसर पर छुट्टी के दिन नगर परिषद कार्यालय के सामने सत्ता पक्ष के पदाधिकारियों द्वारा मुख्याधिकारी के विरुद्ध जोरदार विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसने अब व्यापक जनचर्चा का रूप ले लिया है।
प्रदर्शनकारियों ने मुख्याधिकारी पर कर्तव्य की घोर उपेक्षा, प्रशासनिक लापरवाही तथा वित्तीय प्रबंधन में विफलता के गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि वर्ष 2025-26 के अंतर्गत दलित वस्ती सुधार योजना एवं महाराष्ट्र नगरोउत्थान महाअभियान जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के तहत प्राप्त लगभग एक करोड़ रुपये की विकास निधि, समय पर उपयोग न किए जाने के कारण शासन को वापस चली गई। इसे न केवल प्रशासनिक अक्षमता बल्कि जनहित के प्रतिकूल कृत्य माना जा रहा है, जो महाराष्ट्र नगर परिषद अधिनियम एवं वित्तीय नियमों के संभावित उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि मुख्याधिकारी ने योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया, फॉलोअप तथा अधीनस्थ कर्मचारियों को निर्देश देने में जानबूझकर टालमटोल की, जिसके परिणामस्वरूप शहर विकास कार्यों से वंचित रह गया। साथ ही, उनके कार्यकाल में विभिन्न विकास कार्यों में अनियमितता एवं कथित भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई है।
इसके अतिरिक्त, मुख्याधिकारी पर यह भी आरोप है कि वे नगराध्यक्ष एवं सभापतियों को विश्वास में लिए बिना एकतरफा निर्णय लेते हैं, जो स्थानीय स्वशासन की मूल भावना के विपरीत है। यह आचरण प्रशासनिक पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व के सिद्धांतों का उल्लंघन प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, कार्यालयीन समय में अनुपस्थित रहकर देर शाम ठेकेदारों के साथ बंद कमरे में बैठकें करने के आरोप भी लगाए गए हैं, जिससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और प्रक्रियागत पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगते हैं।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि मुख्याधिकारी के समस्त कार्यकाल की उच्चस्तरीय न्यायिक अथवा विभागीय जांच कराई जाए, प्रथम दृष्टया दोष सिद्ध होने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए तथा संबंधित धाराओं के अंतर्गत विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
खबर लिखे जाने तक मुख्याधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जो स्वयं में प्रशासनिक जवाबदेही के अभाव को दर्शाता है।
इधर, शहर में यह बहस तेज हो गई है कि जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने विकास की जिम्मेदारी सौंपी, वे स्वयं सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति स्थानीय शासन व्यवस्था की विफलता का संकेत मानी जा रही है। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह केवल प्रशासनिक दोष है या जनप्रतिनिधियों की भी समान रूप से जवाबदेही बनती है? यदि निर्वाचित प्रतिनिधि ही विरोध की भूमिका में आ जाएं, तो आम नागरिकों के हितों की रक्षा कौन करेगा?
घुग्घुस की वर्तमान परिस्थिति न केवल प्रशासनिक शिथिलता, बल्कि जवाबदेही के अभाव और समन्वयहीन शासन प्रणाली का उदाहरण बनती जा रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन स्तर पर इस प्रकरण को कितनी गंभीरता से लिया जाता है और क्या वास्तव में दोषियों पर ठोस कार्रवाई होती है या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।




