(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर | 05 जनवरी 2026 की रात से घुग्घुस की राजनीति में उबाल आ गया है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और NCP (अजित पवार गुट) से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा की जा रही तीखी, आरोप–प्रत्यारोप वाली पोस्ट अब केवल ऑनलाइन बहस नहीं रही, बल्कि शहर के नुक्कड़–चौराहों तक चर्चा का विषय बन चुकी है। इन वायरल पोस्टों ने नगर परिषद चुनाव के बाद बने सत्ता समीकरणों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
वायरल दावों के अनुसार, घुग्घुस नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस ने नगराध्यक्ष सहित 11 नगरसेवक निर्वाचित कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। दो अपक्ष नगरसेवकों के समर्थन से कांग्रेस की स्थिति और भी मजबूत मानी जा रही थी। लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि कांग्रेस के ही कुछ नेता, अजित पवार गुट के नगरसेवक को उपाध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के भीतर से ही साजिश रच रहे हैं। कहा जा रहा है कि 14 नगरसेवकों के बने गुट को तोड़ने की योजना के तहत विरोधी दल के नेता को उपाध्यक्ष बनाने का प्रयास किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर पार्टी विरोधी गतिविधि है।
सबसे गंभीर आरोप यह हैं कि जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक पार्टी को खड़ा किया, चुनावों में वोट दिलाए, आज उन्हीं को राजनीतिक रूप से “संपविण्याचा कुटिल डाव” रचा जा रहा है। सोशल मीडिया पोस्टों में यह भी दावा किया गया है कि कुछ नगरसेवकों को धमकियां दी जा रही हैं—कि यदि उपाध्यक्ष नहीं बनाया गया तो परिणाम भुगतने होंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की धमकियों के आरोप स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं।
दूसरी वायरल पोस्ट में आरोपों का दायरा और फैल जाता है। इसमें दावा किया गया है कि भाजपा के एक प्रभावशाली आमदार के इशारों पर कुछ कांग्रेस नेता काम कर रहे हैं। आरोप है कि कांग्रेस के भीतर गुटबाजी कर भाजपा को “स्वीकृत नगरसेवक” दिलाने की साजिश रची जा रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि कांग्रेस शहर अध्यक्ष ही भाजपा के इशारों पर चलने वाले “कटपुतली” बन गए हैं। सवाल उठाया जा रहा है—क्या जनता ने कांग्रेस को इसलिए वोट दिया था कि उसके जनप्रतिनिधि अपने ही दल को कमजोर करें?
नुक्कड़ चर्चाओं में एक और पहलू सामने आ रहा है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ नगरसेवकों की अजित पवार गुट के नगरसेवकों से दोस्ती कोई नई नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी है। ऐसे में उपाध्यक्ष पद की मांग केवल एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि पुराने राजनीतिक समीकरणों का परिणाम मानी जा रही है। चुनाव से पहले भी कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे की धमकी दी थी, लेकिन मांगें पूरी होते ही इस्तीफे टल गए। अब एक बार फिर सोशल मीडिया के जरिए वही दबाव की राजनीति सामने आती दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल जनता के विश्वास को लेकर है। मतदाताओं ने जिन्हें नगरसेवक चुनकर भेजा, उनसे विकास, पारदर्शिता और स्थिर नेतृत्व की उम्मीद की थी—न कि पद और कुर्सी के लिए आपसी खींचतान। क्या ये जनप्रतिनिधि फिर से पहले की तरह अपने दबाव की राजनीति में सफल होंगे, या जनता के सामने जवाबदेह बनेंगे? क्या पद मोह जनसेवा से बड़ा हो गया है?
आने वाले दिनों में प्रस्तावित पत्रकार परिषद और संभावित सामूहिक इस्तीफों की घोषणा से यह साफ हो जाएगा कि यह सब केवल सोशल मीडिया की रणनीति है या वाकई कांग्रेस के भीतर गहरी टूट की आहट। फिलहाल इतना तय है कि घुग्घुस की जनता इस पूरे घटनाक्रम को बारीकी से देख रही है—और समय आने पर अपना फैसला भी सुनाएगी।




