(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर जिले का घुग्घुस एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह केवल जाम या अधूरा पुल नहीं, बल्कि आंदोलन, राजनीति और सत्ता के बाद आई चुप्पी है। घुग्घुस रेलवे फाटक और पुलिया की समस्या वर्षों से आम जनता के लिए अभिशाप बनी हुई है। स्कूली छात्र, मरीज, कामगार और महिलाएं रोज़ाना घंटों जाम में फंसकर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलते रहे हैं।
16 अगस्त 2025 को जब सब्र का बांध टूटा, तब नागरिकों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया। खास बात यह रही कि यह आंदोलन दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हुआ। कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना, एनसीपी सहित सभी दलों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। यहां तक कि भाजपा कार्यकर्ताओं का अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन में शामिल होना स्थानीय राजनीति में बड़ी घटना माना गया।
आंदोलन के दबाव में उसी दिन प्रशासन ने घुग्घुस रेलवे स्टेशन पर बैठक कर एक “संयुक्त नोट” जारी किया। उसमें अस्थायी सड़क मरम्मत, रेलवे स्पैन लॉन्चिंग, डेक स्लैब और दिसंबर 2025 तक यातायात शुरू करने जैसे समयबद्ध वादे किए गए।
लेकिन जनता का संदेह तब भी बरकरार था। कारण साफ था— पिछले चार वर्षों से अधूरा पड़ा वही पुल, वही फाइलें, वही आश्वासन।
इसके बावजूद, पुल का मुद्दा घुग्घुस नगर परिषद चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया। आंदोलन में शामिल लगभग शत-प्रतिशत लोग चुनाव जीतने में सफल रहे। जनता ने भरोसा किया कि अब सत्ता में वही लोग हैं, जिन्होंने सड़क पर खड़े होकर दर्द साझा किया था।
पर आज स्थिति यह है कि— पुलिया पर न काम दिख रहा है, न आंदोलन की आवाज़, न जनप्रतिनिधियों की सक्रियता.
रेलवे गेट पर आज भी घंटों जाम लगता है। इलाज में देरी से मौतों की खबरें सामने आई हैं। महिलाओं और परिवारों में गहरा आक्रोश है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर कलेक्टर और संबंधित विभागों को ज्ञापन दिए, आंदोलन किए, जनता का समर्थन जुटाया—लेकिन अब वही मुद्दा राजनीतिक प्राथमिकता से गायब दिखाई देता है।
स्थानीय चर्चाओं में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि—क्या आंदोलन केवल सत्ता तक पहुंचने का साधन था? क्या जनता का दर्द चुनावी सीढ़ी बनकर रह गया?
अगर ऐसा है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनविश्वास के साथ सीधा धोखा है। लोकतंत्र में आंदोलन का अर्थ समस्या का समाधान होता है, न कि समस्या को भुलाकर कुर्सी संभाल लेना।
आज घुग्घुस की जनता जवाब मांग रही है— वादों का क्या हुआ? समयबद्ध कार्यक्रम कहां गया? और सबसे अहम सवाल—क्या पुलिया सिर्फ चुनावी मुद्दा थी, या सच में जनता के जीवन-मरण का प्रश्न?
अगर अब भी जिम्मेदार चुप रहे, तो यह चुप्पी आने वाले समय में एक और बड़े आंदोलन की भूमिका बन सकती है। क्योंकि घुग्घुस ने एक बार भरोसा किया है—और टूटा हुआ भरोसा इतिहास में हमेशा भारी पड़ता है।




