कांग्रेस-भाजपा कार्यकर्ता एकजुट, अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरे भाजपाई
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस (जिला चंद्रपुर): शहर में लंबे समय से जारी रेलवे फाटक जाम की समस्या को लेकर आखिरकार 16 अगस्त 2025 को नागरिकों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया। सामाजिक कार्यकर्ता माला मेश्राम के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन में कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों के कार्यकर्ता भी शामिल हुए। खास बात यह रही कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर आंदोलन में भाग लिया, जिससे स्थानीय राजनीति में नई चर्चा छिड़ गई है।
समस्या की जड़
घुग्घुस रेलवे गेट पर घंटों जाम रहने से स्कूली छात्र-छात्राएं, मरीज, कामगार और आम नागरिक लंबे समय से परेशान हैं। हाल ही में गेट जाम के कारण एक महिला की इलाज में देरी से हुई मौत ने महिलाओं में भारी आक्रोश पैदा किया। इसी घटना को आंदोलन की बड़ी वजह माना जा रहा है।
माला मेश्राम की भूमिका
18 जुलाई 2025 को माला मेश्राम ने कलेक्टर और संबंधित विभागों को ज्ञापन देकर समस्याओं से अवगत कराया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई न होने पर उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया। मेश्राम को एक ओर जहां “सामाजिक कार्यकर्ता” के रूप में जनता का समर्थन मिला, वहीं दूसरी ओर भाजपा नेताओं की आंदोलन में मौजूदगी ने सबको चौंका दिया।
भाजपा की उलझन
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री, सड़क मंत्री, रेलवे मंत्री, पालकमंत्री और विधायक सभी भाजपा से होने के बावजूद घुग्घुस के भाजपा नेता आंदोलन में शामिल हुए। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह गुटबाजी का नतीजा है या फिर आगामी नगर परिषद चुनावों को ध्यान में रखकर जनता का समर्थन पाने की रणनीति?
आंदोलन का परिणाम – “संयुक्त नोट”
आंदोलन के दबाव में उसी दिन घुग्घुस रेलवे स्टेशन पर बैठक हुई और प्रशासन ने “संयुक्त नोट” जारी किया। इसमें तय हुआ –

18 अगस्त से अस्थायी सड़क मरम्मत का कार्य शुरू होगा। रेलवे स्पैन लॉन्चिंग 28 अगस्त से 28 सितंबर के बीच पूरी की जाएगी। डेक स्लैब का कार्य 15 दिसंबर तक पूर्ण होगा। घुग्घुस से वणी की ओर यातायात दिसंबर 2025 के अंत तक शुरू किया जाएगा।
जनता का संदेह बरकरार
हालांकि समयबद्ध कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है, लेकिन पिछले चार वर्षों से अधूरा पड़ा निर्माण कार्य देखते हुए जनता को भरोसा नहीं है कि वादे पूरे होंगे। यदि पुल दिसंबर तक चालू नहीं हुआ, तो यह मुद्दा आगामी स्थानीय चुनावों में बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
घुग्घुस आंदोलन ने प्रशासन को झकझोरा है और राजनीतिक समीकरणों को भी। अब देखना होगा कि “संयुक्त नोट” में किए गए वादे कितने हकीकत में बदलते हैं और जनता की वर्षों पुरानी समस्या कब तक हल होती है।





