वादों का शौचालय या कागज़ी विकास?
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा आकर्षक “जाहिरनामा” प्रकाशित कर जनता के सामने विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नगर परिषद चुनाव 2025 में भी सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए 37 मुद्दों वाले जाहिरनामे में क्रमांक 6 पर स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था — “शहरात आवश्यक त्या ठिकाणी सार्वजनिक शौचालयाचे बांधकाम केल्या जाईल.”
लेकिन चुनाव के बाद अब शहर में चर्चा इस बात की है कि आखिर पहले वर्ष में इस मुद्दे पर वास्तव में कितना नया काम शुरू हुआ? जनता के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या यह वादा केवल चुनावी भाषणों और बैनरों तक सीमित था, या जमीन पर भी कोई ठोस योजना दिखाई दे रही है?
जानकारों के अनुसार नगर परिषद क्षेत्र के कुछ प्रभागों में सार्वजनिक शौचालयों का भूमिपूजन चुनाव से पहले ही किया गया था और वर्तमान में वही पुराने प्रस्तावित कार्य जारी हैं। ऐसे में नागरिक पूछ रहे हैं कि चुनाव के बाद सत्ता में आने के पश्चात कितने नए शौचालयों को मंजूरी मिली, कितनों का भूमिपूजन हुआ और कितने कार्य वास्तव में शुरू हुए?
शहर के कई हिस्सों में बने सार्वजनिक शौचालय आज भी नागरिकों के लिए सुविधा से अधिक परेशानी का कारण बन रहे हैं। कहीं सफाई व्यवस्था बदहाल है, तो कहीं रोड किनारे बने शौचालयों के आसपास शराबियों और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा महिलाओं और आम नागरिकों के लिए असुरक्षा की स्थिति पैदा कर रहा है। महिलाओं का कहना है कि कई स्थानों पर शौचालय तो हैं, लेकिन वहां स्वच्छता, पानी, प्रकाश व्यवस्था और पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
नागरिकों में यह चर्चा भी खुलकर हो रही है कि नगर परिषद प्रशासन की जिम्मेदारी केवल फाइलों में “सब ठीक है” लिख देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, बांधकाम सभापति, स्वच्छता व आरोग्य सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर की वास्तविक परीक्षा जमीनी निरीक्षण और कार्यों की गुणवत्ता से होगी, न कि केवल एसी केबिन और कूलर के नीचे बैठकर तैयार की गई रिपोर्टों से।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि शहर में सार्वजनिक शौचालयों की वास्तविक आवश्यकता थी, तो पहले वर्ष में बड़े पैमाने पर नए प्रस्ताव और कार्य दिखाई देने चाहिए थे। लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर आम जनता में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं फंड की कमी के कारण विकास कार्य “ऑक्सीजन” पर तो नहीं चल रहे?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी जाहिरनामे की सफलता भाषणों से नहीं, बल्कि पांच वर्षों में किए गए वास्तविक कार्यों से तय होती है। जनता अब केवल घोषणा नहीं, बल्कि काम का हिसाब मांग रही है।
फिलहाल शहर की जनता की नजर सत्ता पक्ष के पहले वर्ष के कामकाज पर टिकी हुई है। अब आने वाला दूसरा वर्ष यह तय करेगा कि “सार्वजनिक शौचालय” का मुद्दा विकास की सच्ची तस्वीर बनेगा या फिर राजनीतिक जुमलेबाजी का एक और उदाहरण साबित होगा।




