नगर परिषद परिसर बना “गो गोवा” आंदोलन का मंच
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगर परिषद कार्यालय परिसर में उस समय राजनीतिक माहौल गरमा गया, जब विपक्षी नगरसेवकों, नगरसेविकाओं और भाजपा पदाधिकारियों ने अनोखे अंदाज में “गो गोवा” आंदोलन छेड़ दिया। आंदोलन में साउंड सिस्टम, शॉवर, नारियल पानी, डांस और व्यंग्यात्मक बैनरों का इस्तेमाल कर नगर परिषद प्रशासन और सत्ताधारी गुट को निशाने पर लिया गया।
आंदोलन के दौरान परिसर में लगे बैनरों पर जनता के टैक्स और विकास कार्यों को लेकर तीखे सवाल लिखे गए थे। कुछ बैनरों में लिखा था — “नागरिकों के घरपट्टी के पैसों से गो गोवा”, “पानी टैक्स के पैसों से गो गोवा”, “दिव्यांग निधि से गो गोवा”, “आरओ मशीन के पैसों से गो गोवा”, “सीमेंट रोड के पैसों से गो गोवा”, “गरीबों के पैसों से गो गोवा”, “विकास गया खड्डे में, ये चले गोवा!”
इन नारों और प्रदर्शन ने पूरे शहर में चर्चा का विषय खड़ा कर दिया।
आखिर गोवा ही क्यों?
विवाद की जड़ उस कथित “प्रशिक्षण दौरे” को लेकर है, जिसके तहत अध्यक्ष सहित कुछ नगरसेवक, नगरसेविकाएं और एक अधिकारी गोवा गए होने की चर्चा है। हालांकि खबर लिखे जाने तक नगर परिषद प्रशासन या मुख्याधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया था।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा प्रशिक्षण था, जिसके लिए गोवा का चयन किया गया? क्या यह प्रशिक्षण महाराष्ट्र के किसी अन्य शहर, संभागीय मुख्यालय या प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्र में नहीं हो सकता था? क्या यह राज्य शासन द्वारा अधिकृत प्रशिक्षण था? यदि था, तो उसकी आधिकारिक अधिसूचना, खर्च और उद्देश्य क्या है? और यदि नहीं, तो क्या जनता के टैक्स के पैसों का दुरुपयोग हुआ? इन्हीं सवालों को लेकर विपक्ष ने आंदोलन को “जनता के पैसों पर पर्यटन” करार दिया।
नगर परिषद नियमों पर भी उठे सवाल
स्थानीय स्वराज संस्थाओं में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए शासन स्तर पर नियम और प्रक्रिया निर्धारित रहती है। सामान्यतः ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए प्रशासनिक मंजूरी, उद्देश्य, खर्च का स्रोत, सहभागियों की सूची और रिपोर्ट आवश्यक मानी जाती है।
राजनीतिक हलकों में अब यह मांग तेज हो रही है कि गोवा दौरे की पूरी अधिकृत जानकारी सार्वजनिक की जाए। कितने लोग गए, इसका खुलासा किया जाए। यात्रा और निवास पर कितना खर्च हुआ, बताया जाए। खर्च किस मद से किया गया, इसकी जानकारी दी जाए। प्रशिक्षण का विषय और आयोजक संस्था कौन थी, यह स्पष्ट किया जाए।
जनता में बढ़ रहा आक्रोश
शहर में पहले से सड़क, नाली, पानी, स्ट्रीट लाइट और मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे समय में गोवा दौरे की चर्चा ने लोगों के बीच नाराजगी और व्यंग्य दोनों पैदा कर दिए हैं।
आंदोलन देखने पहुंचे कई नागरिकों ने खुलकर कहा कि यदि शहर के विकास कार्य अधूरे हैं, तो जनप्रतिनिधियों को पहले स्थानीय समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को आगामी दिनों में और आक्रामक तरीके से उठाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है।
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल घुग्घुस नगर परिषद के मुख्याधिकारी अथवा संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
लेकिन “गो गोवा” आंदोलन ने यह साफ कर दिया है कि जनता अब नगर परिषद के खर्च, प्रशिक्षण दौरों और विकास कार्यों को लेकर जवाब मांग रही है।
घुग्घुस की राजनीति में यह मामला अब केवल एक दौरे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि “जनता का पैसा बनाम राजनीतिक मौज” की बहस में बदलता नजर आ रहा है।




