आज का दिन भारतीय इतिहास में कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं दो महान व्यक्तित्वों—क्रांतिकारी सुखदेव थापर और स्वतंत्र भारत की संसद के पहले लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर—के बारे में, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में देश की दिशा और दशा को प्रभावित किया।
क्रांतिकारी सुखदेव थापर: देशभक्ति की मिसाल
सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को लायलपुर (अब पाकिस्तान में) हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख योद्धा थे और भगत सिंह व राजगुरु के घनिष्ठ सहयोगी रहे। सुखदेव हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सक्रिय सदस्य थे, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और समाजवादी क्रांति लाना था।
सुखदेव का नाम लाहौर षड्यंत्र केस में प्रमुखता से आया, जिसमें उन्हें भगत सिंह और राजगुरु के साथ फांसी की सज़ा सुनाई गई। 23 मार्च 1931 को इन तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। सुखदेव की शहादत आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका साहस, देशप्रेम और बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक स्वर्णिम अध्याय है।
जी.वी. मावलंकर: भारतीय लोकतंत्र के शिल्पकार
गणेश वासुदेव मावलंकर का जन्म 27 नवंबर 1888 को बड़ौदा में हुआ था। वे एक प्रखर नेता, विद्वान और प्रशासक थे। स्वतंत्र भारत में जब पहली बार लोकसभा का गठन हुआ, तब मावलंकर को सर्वसम्मति से प्रथम लोकसभा अध्यक्ष चुना गया। 15 मई 1952 को उन्होंने इस ऐतिहासिक पद की शपथ ली और देश के संसदीय इतिहास की नींव रखी।
जी.वी. मावलंकर ने न केवल लोकसभा की गरिमा बनाए रखी, बल्कि संसदीय परंपराओं को स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्हें भारत में संसदीय लोकतंत्र की नींव का एक मजबूत स्तंभ माना जाता है।
उनकी प्रशासनिक दक्षता, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा आज भी लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए एक आदर्श मानक के रूप में देखी जाती है।
15 मई का दिन हमें दो अलग-अलग लेकिन समान रूप से महान योगदानों की याद दिलाता है—एक ओर है क्रांति की ज्वाला लिए सुखदेव थापर, और दूसरी ओर है लोकतंत्र की नींव रखने वाले जी.वी. मावलंकर।
इन दोनों विभूतियों की स्मृति हमें सिखाती है कि देश की सेवा अनेक रूपों में की जा सकती है—शौर्य से भी और व्यवस्था से भी।
जय हिंद!




