महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के घुग्घुस क्षेत्र में स्थित श्री बहिरम बाबा देवस्थान आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। यह मंदिर क्षेत्र के लोगों की आस्था का केंद्र रहा है, जिसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग 300 वर्षों पुरानी मानी जाती है और इसका संबंध गोंड राजाओं के काल से भी जोड़ा जाता है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक रहा है, जहां जात-पात से परे हर धर्म के लोग बाबा के दर्शन करने आते हैं।
गिरा दिया गया मंदिर का गुंबज
भक्तों के लिए दुखद खबर यह है कि मंदिर का गुंबज अब टूट चुका है, और उसकी जगह अब एक अस्थायी त्रिपाल ने ले ली है। बारिश और बेमौसम बारिश के चलते मंदिर के भीतर पानी टपकने की घटनाएं हो रही हैं। यह केवल एक निर्माण की बात नहीं, बल्कि भक्तों की भावनाओं पर गहरा आघात है।
अनदेखी या साजिश?
यह स्थिति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—क्या यह वर्चस्व की लड़ाई है, राजनीति का खेल, या फिर सरकारी विभागों की घोर लापरवाही? पुरातत्व विभाग, राजस्व विभाग, और स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता इस संकट को और भी गंभीर बना रही है।
मंदिर के चारों ओर संकट की स्थिति
सूत्रों की मानें तो मंदिर के दोनों ओर WCL (वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) की गहरी खाई है, जबकि सामने की दिशा में रेलवे का निर्माण कार्य चल रहा है। भारी मात्रा में उड़ती धूल और कंपनियों की गतिविधियों ने मंदिर की स्थिति को और भी खतरनाक बना दिया है।
मंदिर निर्माण या गुप्त धन की तलाश?
स्थानीय चर्चाओं में यह बात तेजी से फैल रही है कि कुछ लोगों ने मंदिर को फिर से बनाने की कोशिश की थी, लेकिन जनता को विश्वास में लिए बिना कार्य शुरू कर दिया गया, जिसके चलते विरोध हुआ और कार्य रोक दिया गया।
अब यह भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या वास्तव में यह मंदिर का नवीनीकरण कार्य था या गुप्त धन की तलाश? क्या इसके लिए पुरातत्व विभाग से NOC ली गई थी?
राजनीतिक हस्तक्षेप और शंका के बादल
बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व के बावजूद मंदिर को कोई ठोस लाभ नहीं मिला है। चर्चाओं के अनुसार कुछ राजनेताओं और निजी कंपनियों के गठजोड़ ने इस मंदिर को संकट में डाल दिया है।
क्या होगी जांच?
अब स्थानीय लोगों की मांग है कि पुलिस विभाग इस मामले की सघन जांच करे और सच्चाई को जनता के सामने लाए। साथ ही पुरातत्व विभाग को भी इस ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
श्री बहिरम बाबा देवस्थान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां आस्था, राजनीति और लालच के बीच इसकी पहचान धूमिल होती जा रही है। यह समय है जब समाज, प्रशासन और भक्तगण मिलकर इस मंदिर की पुरानी गरिमा को पुनः स्थापित करने के लिए एकजुट हों।
यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और संस्कृति की जीवंत धरोहर है।




