10×10 के प्लॉट के नाम पर 8 लाख रुपये मिलने का कथित झांसा, कोल माइन्स के नाम पर जमीन के कारोबार की चर्चा और खरीदारों की सुरक्षा पर सवाल; क्या कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में ही दबा रहेगा?
प्रणयकुमार बंडी
वणी, यवतमाल | यवतमाल जिले की वणी तहसील के अंतर्गत आने वाले शिवनी, चिंचोली और साखरा गांवों में जमीन की कथित NA प्रक्रिया और प्लॉटिंग को लेकर खरीदारों की चिंता बढ़ाने वाले सवाल सामने आ रहे हैं। जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, कोल माइन्स से जुड़ी संभावनाओं को आधार बनाकर लोगों को भविष्य में लाभ मिलने की उम्मीद दिखाई जा रही हो और जमीन के दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट न हो, तो ऐसे कारोबार की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
इस क्षेत्र में कथित जमीन दलाली और प्लॉटिंग को लेकर स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवाल केवल जमीन खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं हैं। इनके केंद्र में राजस्व रिकॉर्ड, गैर-कृषि उपयोग की अनुमति, जमीन के वास्तविक मालिकाना हक, संभावित अधिग्रहण, खरीदारों के निवेश और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे गंभीर मुद्दे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन के कारोबार में सब कुछ नियमानुसार हो रहा है, तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किए जाते? और यदि किसी स्थान पर नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई का इंतजार आखिर कब तक किया जाएगा?
कोल माइन्स के नाम पर उम्मीदों का बाजार या जमीन के कारोबार का जोखिम?
शिवनी–चिंचोली–साखरा क्षेत्र में कोयला खदानों और संभावित अधिग्रहण से संबंधित चर्चाओं के बीच जमीन की कीमतों और छोटे प्लॉटों को लेकर लोगों की उम्मीदें बढ़ सकती हैं। लेकिन किसी क्षेत्र में कोल माइन्स होना, भविष्य में जमीन का अधिग्रहण होना या किसी भूमि के बदले मुआवजा मिलने की संभावना होना अपने आप में किसी निजी प्लॉट की वैधता या मुआवजे की गारंटी नहीं है।
इसी संदर्भ में 10×10 के कथित प्लॉट के बदले 8 लाख रुपये मिलने का दावा जांच का विषय बनता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह राशि किस आधार पर बताई जा रही है, जमीन का क्षेत्रफल और स्थान क्या है, उसका कानूनी स्वरूप क्या है और क्या संबंधित जमीन किसी अधिग्रहण अधिसूचना या आधिकारिक योजना के अंतर्गत आती है।
जब तक इन तथ्यों की पुष्टि नहीं होती, तब तक किसी भी व्यक्ति को निश्चित मुआवजे या बड़े आर्थिक लाभ का आश्वासन देना खरीदारों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
सवाल यह है कि क्या लोगों को वास्तविक सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जानकारी दी जा रही है, या भविष्य के संभावित लाभ का सपना दिखाकर जमीन के सौदों को बढ़ावा दिया जा रहा है?

तहसीलदार से लेकर जनप्रतिनिधियों तक, जवाबदेही किसकी?
इस पूरे मामले में तहसीलदार, राजस्व विभाग, पटवारी, ग्राम सचिव, खंड विकास अधिकारी (BDO), स्थानीय जनप्रतिनिधियों, विधायक, सांसद, पुलिस पाटिल और संबंधित अन्य विभागों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं।
हालांकि, किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि की कथित मिलीभगत का निष्कर्ष बिना दस्तावेजी प्रमाण और निष्पक्ष जांच के निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि प्रशासन से जवाबदेही मांगने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
यदि किसी गांव में कृषि भूमि पर कथित प्लॉटिंग की जा रही है, तो राजस्व रिकॉर्ड और भूमि उपयोग की स्थिति की जांच कौन करेगा? यदि विकास या प्लॉटिंग के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक है, तो उसकी पुष्टि कौन करेगा? यदि खरीदारों को गलत जानकारी देकर रकम वसूली गई है, तो शिकायत पर कार्रवाई किसकी जिम्मेदारी होगी?
स्थानीय प्रशासन को इन सवालों का दस्तावेजी जवाब देना चाहिए। संबंधित अधिकारियों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित गांवों में जमीन के उपयोग परिवर्तन, लेआउट की मंजूरी, भूखंडों के हस्तांतरण और संभावित अधिग्रहण के संबंध में कौन-कौन से नियम लागू होते हैं।
कोल कंपनियों के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल तभी ठोस रूप से उठेंगे, जब किसी विशिष्ट दावे, पत्राचार, भुगतान या कथित आश्वासन का प्रमाण सामने आए। किसी कंपनी का क्षेत्र में संचालन होना अपने आप में उसके अधिकारियों की निजी जमीन के सौदों में भागीदारी का प्रमाण नहीं है।

महाराष्ट्र के कानून क्या कहते हैं?
महाराष्ट्र में जमीन की वैधता और प्लॉटिंग को केवल मौखिक दावों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। संबंधित भूमि पर लागू कानून, क्षेत्रीय विकास योजना और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी की जांच जरूरी है।
- महाराष्ट्र जमीन महसूल संहिता, 1966
महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता के अंतर्गत भूमि उपयोग परिवर्तन और गैर-कृषि उपयोग से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं। लेकिन NA की प्रक्रिया प्रत्येक भूमि और क्षेत्र की स्थिति के अनुसार जांची जानी चाहिए। वर्ष 2025–26 में हुए कानूनी बदलावों के कारण कुछ परिस्थितियों में अलग NA अनुमति की आवश्यकता से संबंधित नियम बदले हैं। इसलिए केवल पुराने नियमों के आधार पर किसी जमीन को वैध या अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा।
- महाराष्ट्र में जमीन के छोटे टुकड़ों और प्लॉटिंग के नियम
महाराष्ट्र Prevention of Fragmentation and Consolidation of Holdings Act, 1947 के अंतर्गत कृषि भूमि के विभाजन और हस्तांतरण पर कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। प्रस्तावित भूखंड का आकार, भूमि का वर्गीकरण और लागू छूट या संशोधन जांचना आवश्यक है। वर्ष 2023 में छोटे भूखंडों के हस्तांतरण से संबंधित प्रस्तावित नियमों पर भी चर्चा हुई थी; इसलिए किसी प्रस्ताव को स्वतः लागू कानून मान लेना सही नहीं होगा।
- रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) अधिनियम, 2016 यानी RERA
जहां किसी प्लॉटेड रियल एस्टेट परियोजना पर RERA के प्रावधान लागू होते हैं, वहां परियोजना के पंजीकरण और अन्य नियामकीय आवश्यकताओं की जांच की जानी चाहिए। प्रत्येक जमीन की बिक्री पर एक जैसे नियम लागू नहीं होते; परियोजना की प्रकृति और कानूनी छूट भी महत्वपूर्ण हैं।
इन कानूनों का उद्देश्य यह नहीं कि हर निजी जमीन की बिक्री को स्वतः अवैध मान लिया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जमीन का सौदा लागू कानूनों, वैध दस्तावेजों और खरीदारों को दी गई सही जानकारी के आधार पर हो।

इनकम टैक्स विभाग की भूमिका क्या होनी चाहिए?
यदि जमीन के सौदों में बड़े पैमाने पर नकद लेनदेन, आय छिपाने, कर चोरी या बेनामी संपत्ति से संबंधित ठोस संकेत मिलते हैं, तो इनकम टैक्स विभाग अपने अधिकार क्षेत्र में जांच कर सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: जमीन की NA अनुमति देना या अवैध लेआउट पर कार्रवाई करना इनकम टैक्स विभाग का सामान्य काम नहीं है। उसकी भूमिका संदिग्ध वित्तीय लेनदेन, अघोषित आय और कर कानूनों के संभावित उल्लंघन से संबंधित होती है।
यदि कथित तौर पर 10×10 के प्लॉट के लिए 8 लाख रुपये का सौदा किया जा रहा है, तो जांच में यह देखा जा सकता है कि रकम किसे दी जा रही है, भुगतान का स्रोत क्या है, उसका उचित लेखा-जोखा है या नहीं और संबंधित लेनदेन में कोई कर संबंधी अनियमितता तो नहीं है।
हालांकि, केवल बड़ी कीमत या नकद भुगतान की चर्चा अपने आप में कर चोरी का प्रमाण नहीं है। शिकायत के साथ उपलब्ध रसीदें, भुगतान के प्रमाण, विज्ञापन, संदेश और अन्य संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

CID और CBI की जांच कब हो सकती है?
यदि जमीन के कारोबार में धोखाधड़ी, जाली दस्तावेज, संगठित ठगी या अन्य संज्ञेय अपराध के प्रमाण मिलते हैं, तो पुलिस कानून के अनुसार जांच कर सकती है। मामले की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा विशेष जांच दल (SIT) या CID को जांच सौंपे जाने की मांग भी की जा सकती है।
CBI की जांच के लिए भी उसका वैधानिक अधिकार क्षेत्र और लागू प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। राज्य के मामलों में CBI की जांच स्वतः शुरू नहीं हो जाती; संबंधित कानूनी शर्तों और आवश्यक सहमति या न्यायिक आदेश की स्थिति देखनी पड़ती है।
इसलिए केवल संदेह के आधार पर CID या CBI जांच की मांग करना और जांच का कानूनी आधार मौजूद होना, दोनों अलग बातें हैं। यदि शिकायतकर्ताओं के पास ठगी, जालसाजी, अवैध भुगतान या अधिकारियों की कथित मिलीभगत के दस्तावेजी प्रमाण हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच की मांग की जा सकती है।

‘सेक्शन 9’ से पहले कार्रवाई होगी या बाद में?
इस मुद्दे में सेक्शन 9 का उल्लेख महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित क्षेत्र में किस अधिनियम के अंतर्गत किस अधिसूचना या कार्यवाही की बात की जा रही है। केवल ‘सेक्शन 9’ कहने से कानूनी प्रक्रिया की सही पहचान नहीं होती।
यदि मामला कोयला खदान या भूमि अधिग्रहण से संबंधित है, तो संबंधित अधिसूचना, भूमि का सर्वे नंबर, अधिग्रहण की सीमा और लागू अधिनियम की पुष्टि की जानी चाहिए। इसके बाद ही यह तय किया जा सकता है कि अधिग्रहण से पहले या उसके दौरान कौन-सी कार्रवाई किस विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है।
यदि किसी जमीन पर अनधिकृत प्लॉटिंग या खरीदारों को गुमराह करने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित विभागों को केवल भविष्य की अधिग्रहण प्रक्रिया का इंतजार किए बिना अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध कानूनी उपायों पर विचार करना चाहिए।
प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित जमीन के बारे में कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी हुई है या नहीं और यदि हुई है, तो उससे जमीन के मालिकाना हक, हस्तांतरण और संभावित मुआवजे पर क्या प्रभाव पड़ता है।

क्या लोगों को 8 लाख रुपये का सपना दिखाकर ठगी की जा रही है?
यह सबसे गंभीर सवाल है, लेकिन इसका उत्तर अफवाहों या अनुमानों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और जांच से मिलना चाहिए।
यदि किसी खरीदार को किसी प्लॉट के बदले निश्चित मुआवजे का आश्वासन दिया गया है, तो उसे लिखित आधार मांगना चाहिए। किस सरकारी आदेश में राशि निर्धारित है? क्या संबंधित जमीन अधिग्रहण की अधिसूचना में शामिल है? क्या विक्रेता के पास वैध स्वामित्व है? क्या प्लॉट का कानूनी विभाजन और उपयोग अनुमत है?
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देकर पैसे लेता है, तो परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर धोखाधड़ी से संबंधित कानूनी कार्रवाई हो सकती है। लेकिन वास्तविक अपराध और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान जांच के बाद ही की जानी चाहिए।
जमीन खरीदने वालों को 7/12 उतारा, नमूना 8-अ, लागू NA या भूमि उपयोग संबंधी आदेश, स्वीकृत लेआउट, स्वामित्व और भार संबंधी रिकॉर्ड तथा संबंधित अधिग्रहण अधिसूचना की स्वतंत्र पुष्टि करनी चाहिए। केवल स्टाम्प पेपर, दलाल की रसीद या मौखिक आश्वासन को जमीन की वैधता का अंतिम प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

राजनीति और प्रशासन के सामने पांच सीधे सवाल
- शिवनी, चिंचोली और साखरा में कथित प्लॉटिंग की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या संबंधित विभागों ने रिकॉर्ड के आधार पर जांच की है?
- 10×10 के प्लॉट के बदले 8 लाख रुपये मिलने के कथित दावे का आधार क्या है? क्या कोई आधिकारिक आदेश या लिखित प्रमाण उपलब्ध है?
- क्या संबंधित जमीनों पर लागू भूमि उपयोग, प्लॉटिंग और हस्तांतरण संबंधी नियमों का पालन किया जा रहा है?
- क्या किसी खरीदार ने ठगी, जाली दस्तावेज या गलत आश्वासन की शिकायत की है? यदि हां, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?
- क्या जिला प्रशासन संबंधित सर्वे नंबरों, भूमि उपयोग, अधिग्रहण की स्थिति और स्वीकृत प्लॉटिंग संबंधी रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कराकर तथ्य सार्वजनिक करेगा?
इन सवालों का जवाब देना किसी राजनीतिक दल या अधिकारी के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़े होने का मामला नहीं है। यह नागरिकों की संपत्ति, आर्थिक सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा विषय है।

कार्रवाई दस्तावेजों पर हो, दबाव या लालच पर नहीं
शिवनी–चिंचोली–साखरा क्षेत्र में जमीन के कथित कारोबार को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और कानून के निष्पक्ष पालन से ही संभव है।
यदि जमीन के सौदे वैध हैं, तो संबंधित रिकॉर्ड सामने आने चाहिए। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी खरीदार के साथ धोखाधड़ी हुई है, तो उसकी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि की संलिप्तता के प्रमाण मिलते हैं, तो पद या राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या शासन-प्रशासन संभावित नुकसान से पहले नागरिकों को सही जानकारी देकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, या फिर शिकायतों और आरोपों के बीच खरीदारों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा?
समय आने पर फिर चर्चा होगी, लेकिन उससे पहले जरूरी है कि जमीन के हर दावे की सच्चाई रिकॉर्ड पर आए। क्योंकि जमीन खरीदने वाले नागरिकों को सपने नहीं, कानूनी सुरक्षा चाहिए; आश्वासन नहीं, प्रमाण चाहिए; और प्रभावशाली दलाली नहीं, निष्पक्ष प्रशासन चाहिए।




