सरकारी निधि से बने उद्यान में ठेकेदार का डेरा! कामगारों की अस्थायी वसाहत, टैंकर-ट्रैक्टर और निर्माण सामग्री से पार्क का स्वरूप बदला; जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस, चंद्रपुर : घुग्घूस के शिवनगर स्थित भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी उद्यान इन दिनों एक नए विवाद के केंद्र में है। सूत्रों के अनुसार, करीब 99 लाख 87 हजार रुपये की लागत से विकसित किए गए इस उद्यान परिसर का इस्तेमाल एक निजी ठेकेदार द्वारा अपने कामगारों और निर्माण कार्य से संबंधित सामग्री रखने के लिए किया जा रहा है।

बताया जा रहा है कि उद्यान परिसर में ठेकेदार के कामगारों के लिए अस्थायी वसाहत जैसी व्यवस्था, पानी के टैंकर, ट्रैक्टर, मिक्सर तथा अन्य निर्माण सामग्री खड़ी की जा रही है। सवाल यह है कि जनता के लिए सरकारी निधि से विकसित किया गया उद्यान आखिर निजी ठेकेदारी गतिविधियों के लिए कैसे इस्तेमाल हो रहा है?
उद्यान का सौंदर्यीकरण या ठेकेदारी का स्टोरेज यार्ड?
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि उद्यान में सरकारी निधि से लगाए गए कई साहित्य और सुविधाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। यदि सार्वजनिक निधि से तैयार संपत्ति को निजी कामकाज के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और उससे सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंच रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
स्थानीय नागरिकों का सवाल सीधा है—क्या किसी ठेकेदार को नगर परिषद की संपत्ति का इस तरह उपयोग करने की अनुमति दी गई है? यदि अनुमति है तो उसका आदेश, अवधि और शर्तें क्या हैं? और यदि अनुमति नहीं है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

नगर परिषद की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
इस मामले में घुग्घूस नगर परिषद के मुख्याधिकारी, बांधकाम विभाग, संबंधित इंजीनियर, स्वच्छता विभाग, सुपरवाइजर तथा संबंधित जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
आखिर नगर परिषद की संपत्ति की निगरानी कौन करता है? संबंधित अधिकारी नियमित निरीक्षण करते हैं या नहीं? यदि निरीक्षण किया गया, तो उद्यान परिसर में निर्माण सामग्री और कामगारों की अस्थायी व्यवस्था दिखाई क्यों नहीं दी?
स्थानीय नागरिक यह भी जानना चाहते हैं कि संबंधित ठेकेदार को उद्यान परिसर इस्तेमाल करने की लिखित अनुमति किसने दी? यदि कोई अनुमति नहीं है, तो नगर परिषद प्रशासन द्वारा अब तक क्या कार्रवाई की गई?

राजनीति और ठेकेदारी के बीच सरकारी संपत्ति कहां?
मामला केवल एक उद्यान के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। यह सवाल सरकारी संपत्ति, ठेकेदारी व्यवस्था और स्थानीय राजनीतिक-प्रशासनिक निगरानी की कार्यप्रणाली पर भी खड़ा करता है।
जनता के पैसे से बनाई गई संपत्ति किसी निजी गतिविधि के लिए इस्तेमाल होती है, तो जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है। लेकिन यदि अधिकारी और जनप्रतिनिधि शिकायत या स्थिति से अवगत होने के बावजूद कार्रवाई नहीं करते, तो नागरिकों के मन में संरक्षण और मौन सहमति को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
हालांकि, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि ठेकेदार या किसी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि की मिलीभगत का निष्कर्ष आधिकारिक जांच के बिना नहीं निकाला जा सकता। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना आवश्यक है।

लोकार्पण फलक भी चर्चा में
उद्यान परिसर में लगे लोकार्पण फलक के अनुसार, यह कार्य महाराष्ट्र शासन के तत्कालीन वित्त मंत्री एवं विधायक सुधीर मुनगंटीवार के माध्यम से मंजूर हुआ था। फलक पर कार्य का विवरण “मौजा-घुग्घूस, वार्ड क्रमांक 5 अंतर्गत अटल बिहारी वाजपेयी गार्डन परिसरातील मोकळ्या जागेचे सौंदर्यीकरण करणे” तथा लागत 99.87 लाख रुपये दर्ज है।
फलक पर लोकार्पण की तारीख 8 जुलाई 2020 अंकित है। साथ ही तत्कालीन विधायक सुधीर मुनगंटीवार के नाम के साथ देवराव भोंगळे, निरीक्षण तांड्रा, संतोष सुने, नितु चौधरी, रंजीत आगदारी तथा अन्य पदाधिकारियों एवं ग्रामवासियों की प्रमुख उपस्थिति का उल्लेख किया गया है।
अब नागरिकों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि लोकार्पण के समय वास्तव में कौन-कौन उपस्थित था और किसकी क्या भूमिका थी? इसका स्पष्ट उत्तर उपलब्ध दस्तावेजों, कार्यक्रम रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयानों से ही सामने आ सकता है।

अब सवाल कार्रवाई का है
शिवनगर के नागरिकों की मांग है कि नगर परिषद प्रशासन तत्काल उद्यान का निरीक्षण करे, सरकारी संपत्ति को हुए संभावित नुकसान का पंचनामा करे, उद्यान परिसर के वर्तमान उपयोग की वैधता स्पष्ट करे और यदि किसी प्रकार का अनधिकृत कब्जा अथवा उपयोग पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि—उद्यान परिसर के इस्तेमाल की अनुमति किसने दी? ठेकेदार को वहां कामगार रखने की अनुमति है या नहीं? टैंकर, ट्रैक्टर और मिक्सर रखने की अनुमति किस आदेश के तहत है? क्षतिग्रस्त सार्वजनिक संपत्ति की भरपाई कौन करेगा? और सबसे अहम—99.87 लाख रुपये की लागत से बनी सार्वजनिक संपत्ति की निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी और किस व्यवस्था की है?
अब निगाहें घुग्घूस नगर परिषद प्रशासन और संबंधित जनप्रतिनिधियों पर हैं। शिवनगर की जनता जवाब चाहती है—सरकारी उद्यान जनता के लिए है या ठेकेदारी गतिविधियों के लिए?




