(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर जिले के औद्योगिक क्षेत्र घुग्घुस में प्रदूषण अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि जनजीवन पर मंडराता गंभीर संकट बन चुका है। धूल, धुआं और जहरीली गैसों के बीच सांस लेने को मजबूर आम नागरिकों का धैर्य जवाब देने लगा है। बावजूद इसके, समस्या के समाधान की दिशा में कोई ठोस निष्कर्ष या निर्णायक कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि क्षेत्र में संचालित कंपनियां नियमों को ताक पर रखकर उत्पादन बढ़ाने में जुटी हैं, जबकि प्रदूषण नियंत्रण के उपाय केवल कागजों तक सीमित हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि लोग इसे “धीमी मौत” करार देने लगे हैं। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों में सांस और त्वचा संबंधी रोगों की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठ रहा है। जनता का कहना है कि पावर मिलने के बाद भी जनप्रतिनिधि उस शक्ति का उपयोग जनहित में करने में विफल साबित हो रहे हैं। आरोप है कि वे कंपनियों के कठपुतली बनकर रह गए हैं और जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता अब खामोश नजर आ रहे हैं।
वहीं, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (चंद्रपुर कार्यालय) की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। नागरिकों का आरोप है कि प्रदूषण मापने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और शिकायतों पर अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई जाती। इसी तरह जिला प्रशासन और पुलिस महकमे की भूमिका पर भी उंगली उठ रही है। लोगों का कहना है कि जब स्थिति जनस्वास्थ्य से जुड़ी हो, तब प्रशासन की निष्क्रियता कई गंभीर आलोचनाओं को जन्म देती है।
जनता की मांग है कि समय रहते सख्त कदम उठाए जाएं। नियमों की अनदेखी कर काम करने वाले कंपनी प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ गैरइरादतन मानवहत्या (स्वदोष मानवहत्या) समेत कड़ी धाराओं में मामला दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में कोई भी जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके।
घुग्घुस की सड़कों पर अब एक ही सवाल गूंज रहा है — क्या विकास की कीमत लोगों की सेहत और जिंदगी से चुकाई जाएगी? यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि अब भी नहीं चेते, तो यह आक्रोश किसी बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।




