(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर | घुग्घुस शहर में ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण का मुद्दा अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि नगर परिषद की पारदर्शिता और मंशा पर भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म MH34 जनता की आवाज पर वायरल हो रही एक खबर ने नगर परिषद, जनप्रतिनिधियों और औद्योगिक कंपनी के रिश्तों को कटघरे में (दिनांक.15/01/2026, गुरुवार) खड़ा कर दिया है।
वायरल पोस्ट के अनुसार, शहर में बढ़ते ध्वनि व वायु प्रदूषण को लेकर जब घुग्घुस नगर परिषद के नगराध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कंपनी प्रतिनिधि से सवाल पूछे गए, तो जनहित में कड़ी कार्रवाई की बात करने वाले जनप्रतिनिधि कंपनी के “शुभ चिंतक” की भूमिका में नजर आए। यही विरोधाभास अब शहर भर में चर्चा और नाराज़गी का कारण बन रहा है।
बंद कमरे में बैठक, बाहर जनता और मीडिया
सबसे गंभीर सवाल तब खड़ा हुआ जब नगर परिषद कार्यालय में एक विशेष बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में नगराध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कुछ चुनिंदा नगरसेवक, कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता, और कंपनी के प्रतिनिधि शामिल थे।
लेकिन वायु और ध्वनि प्रदूषण को लेकर शिकायत करने वाले निवेदक (निवेदनकर्ता नहीं, बल्कि पीड़ित नागरिक) और अन्य मीडिया प्रतिनिधि, जो उसी समय नगर परिषद परिसर में मौजूद थे, उन्हें बैठक में बुलाना जरूरी नहीं समझा गया।
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सवाल जो जवाब मांगते हैं
इस पूरे घटनाक्रम ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या कांग्रेस के कार्यकर्ता इस बैठक के पात्र हो सकते हैं, लेकिन प्रदूषण से प्रभावित निवेदक नहीं? जिनकी शिकायत पर मामला उठा, उन्हीं को बैठक से बाहर क्यों रखा गया? जब परिसर में कुछ मीडिया प्रतिनिधि मौजूद थे, तो केवल एक खास सोशल मीडिया प्रतिनिधि को ही क्यों बुलाया गया? क्या बाकी मीडिया ने कभी खबरें नहीं चलाईं? या फिर सवाल पूछने वाले मीडिया से परहेज किया गया? यह बैठक जनहित की थी या पार्टी और कंपनी हित की? जनहित या मिलीभगत?
नगर परिषद का यह रवैया यह संकेत देता है कि प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर भी चयनित लोगों के साथ बंद कमरे में निर्णय लिए जा रहे हैं, जबकि आम नागरिक और पीड़ित पक्ष को जानबूझकर दूर रखा जा रहा है।
यदि वास्तव में यह बैठक जनहित में थी, तो पारदर्शिता से क्यों डर? और यदि पारदर्शिता नहीं थी, तो यह संदेह और गहराता है कि कहीं यह बैठक जनहित नहीं, बल्कि कंपनी और राजनीतिक समीकरणों की रक्षा के लिए तो नहीं थी।
घुग्घुस की जनता अब सिर्फ बयानों से संतुष्ट नहीं है। उन्हें जवाब चाहिए — साफ, स्पष्ट और सार्वजनिक। वरना यह सवाल और तेज़ होगा कि नगर परिषद जनता के लिए है या प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों के लिए?




