घुग्घुस शहर एक बार फिर औद्योगिक विकास और नागरिकों के जीवन अधिकार के टकराव का गवाह बन रहा है। शहर की घनी आबादी के बीच स्थित एक मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड के स्टील व पावर प्लांट से हो रहे अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण को लेकर अब मामला केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है।
स्थानीय सामाजिक संस्था Breath of Life Multipurpose Society के अध्यक्ष प्रणयकुमार शंकर बंडी और सामाजिक कार्यकर्ता बबलू मुंडे द्वारा नगर परिषद, जिला प्रशासन और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) को सौंपे गए लिखित निवेदन में कंपनी पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 तथा Noise Pollution Rules, 2000 के खुले उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
“दिन-रात का शोर, बिगड़ता स्वास्थ्य”
निवेदन के अनुसार, पावर प्लांट से दिन-रात उठने वाली तेज आवाज रिहायशी क्षेत्र के लिए तय मानकों से कहीं अधिक है। यह शोर केवल असहजता नहीं, बल्कि नींद न आना, मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप, सिरदर्द और बच्चों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर जैसे गंभीर परिणाम पैदा कर रहा है।
मराठी में MPCB को भेजी गई शिकायत में तो यह भी कहा गया है कि रोज़ाना एक से दो घंटे तक चलने वाला प्रचंड शोर नागरिकों को स्थायी बहरेपन के खतरे तक पहुँचा रहा है।
हवा में ज़हर, प्रशासन मौन?
ध्वनि के साथ-साथ प्लांट से निकलने वाला धुआं, फ्लाई ऐश और सूक्ष्म धूलकण आसपास के इलाकों में सांस संबंधी बीमारियों, आंखों में जलन, त्वचा रोग और पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसके बावजूद यह सवाल उठना लाज़मी है कि
क्या कंपनी को तय मानकों से अधिक प्रदूषण फैलाने की मौन अनुमति मिली हुई है?
नागरिकों का आरोप है कि बार-बार मौखिक और लिखित शिकायतों के बावजूद न तो प्रभावी साउंड कंट्रोल सिस्टम लगाए गए और न ही प्रदूषण नियंत्रण के ठोस उपाय किए गए। इससे प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह पैदा हो रहा है।
पारदर्शिता पर सीधे सवाल
MPCB को भेजी गई शिकायत में नागरिकों ने सीधे सवाल दागे हैं—क्या कंपनी को ध्वनि प्रदूषण की अनुमति दी गई है? स्वीकृत डेसीबल सीमा क्या है? पिछले तीन वर्षों में कितनी शिकायतें आईं और उन पर क्या कार्रवाई हुई? आख़िरी निरीक्षण कब हुआ और उसकी रिपोर्ट कहाँ है? इन सवालों ने स्पष्ट कर दिया है कि मामला केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि सूचना, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है।
चेतावनी: सड़क से अदालत तक
निवेदन में साफ शब्दों में कहा गया है कि यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो नागरिकों को आंदोलन, उपोषण और जनहित याचिका (PIL) का रास्ता अपनाना पड़ेगा। इसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी स्थिति की जिम्मेदारी प्रशासन और कंपनी की होगी।
बड़ा सवाल
घुग्घुस में उठता यह विवाद एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—
क्या औद्योगिक उत्पादन नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन से बड़ा हो गया है?
यदि नियम केवल काग़ज़ों तक सीमित रहेंगे और निगरानी तंत्र निष्क्रिय रहेगा, तो यह संकट घुग्घुस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राज्य की औद्योगिक नीति पर सवालिया निशान बन सकता है।
अब देखना यह है कि प्रशासन और MPCB इस जनआक्रोश को गंभीरता से लेते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।




