(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस नगर परिषद में नगराध्यक्ष के चयन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उपनगराध्यक्ष को लेकर खड़ा हो गया है। रोशन पचारे, राजूरेड्डी प्रोद्धटूरी, दिलीप पिट्ठलवार, विवेक बोडे, रवीश सिंग, आशीष माशिरकर — या फिर कोई अप्रत्याशित नाम? यही सवाल आज हर गली, हर नुक्कड़ और हर चाय की दुकान पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह पद केवल एक औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नगर की सत्ता-समीकरण का अहम मोहरा है। उपनगराध्यक्ष का चयन यह तय करेगा कि परिषद विकास की राह पकड़ेगी या फिर जोड़–तोड़ और सौदेबाज़ी की राजनीति में उलझी रहेगी।
मंगलवार की घटना ने बढ़ाई सियासी हलचल
मंगलवार दोपहर अचानक कांग्रेस के एक पार्षद का चंद्रपुर में दिखाई न देना राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा गया। कुछ ही देर में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। जिले का खुफिया तंत्र भी सक्रिय नजर आया, मानो किसी बड़े राजनीतिक ‘ऑपरेशन’ की आशंका हो।
कुछ समय बाद संबंधित पार्षद कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मिल गया, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था—जनता के मन में संदेह का बीज बोया जा चुका था।
रुपया और पद की लालसा? या साजिश?
चर्चा यह भी चली कि कथित तौर पर “रुपये और पद की लालसा” में पार्षद को तोड़ने की कोशिश हुई। यह आरोप कितना सच है, इसका कोई ठोस प्रमाण फिलहाल सामने नहीं आया। परंतु सवाल यह है कि ऐसी चर्चाओं को जन्म ही क्यों मिलता है?
क्या नगर परिषद की राजनीति इतनी कमजोर हो चुकी है कि हर निर्णय के पीछे खरीद-फरोख्त की आशंका खड़ी हो जाती है?
जनादेश बनाम जोड़–तोड़
घुग्घुस की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया था—स्थिरता और विकास के लिए। लेकिन यदि उपनगराध्यक्ष का चयन जनहित के बजाय सियासी सौदेबाज़ी से तय होता है, तो यह लोकतंत्र के साथ खुला मज़ाक होगा।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विकास, पानी, सड़क, सफाई जैसे मूल मुद्दों से ज्यादा चर्चा “कौन बिकेगा” और “कौन टूटेगा” पर केंद्रित है।
जिम्मेदारी किसकी?
सिर्फ विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष और सभी दलों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शिता बनाए रखें। राजनीतिक दल यदि अपने ही पार्षदों पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तो सवाल उनकी आंतरिक लोकतांत्रिक संस्कृति पर भी उठता है।
जनता देख रही है, याद भी रखेगी
घुग्घुस की जनता अब केवल दर्शक नहीं है। वह हर चाल, हर दांव को देख रही है और समय आने पर उसका हिसाब भी मांगेगी।
उपनगराध्यक्ष की कुर्सी किसे मिलेगी, यह जल्द साफ हो जाएगा। लेकिन यह जरूर तय होगा कि यह फैसला लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करेगा या फिर घुग्घुस की राजनीति को एक और विवादास्पद अध्याय देगा।
फिलहाल, घुग्घुस की फिज़ा में सिर्फ एक ही सवाल तैर रहा है—उपनगराध्यक्ष जनता की पसंद बनेगा, या सत्ता की सौदेबाज़ी का परिणाम?




