प्रभाग 11 में पवन आगदारी कांग्रेस के उम्मीदवार, पत्नी रंजिता अपक्ष के रूप में मैदान में; शहर में फैला भ्रम और सवालों की बौछार
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घूस, चंद्रपुर — नगर परिषद चुनाव में इस बार घुग्घूस की राजनीति बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। कांग्रेस पार्टी के प्रभाग क्रमांक 11 के नगरसेवक पद के उम्मीदवार पवन आगदारी की पत्नी रंजिता आगदारी ने नगराध्यक्ष पद के लिए अपक्ष उम्मीदवार के रूप में ताल ठोककर न केवल शहर की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रंजिता आगदारी का चुनाव चिन्ह ‘टोपली’ चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है। पति कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार और पत्नी अपक्ष—यह समीकरण न केवल नागरिकों को उलझा रहा है, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
कांग्रेस के लिए नई चुनौती
पवन आगदारी की पत्नी की एंट्री से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ना स्वाभाविक है। एक तरफ पार्टी अधिकृत उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए जुटी है, वहीं दूसरी तरफ उसी परिवार की सदस्य अलग मोर्चा खोलकर कांग्रेस की आंतरिक एकजुटता पर सवाल पैदा कर रही हैं।
पार्टी कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि यह स्थिति “घर-घर में दो खेमे” जैसा वातावरण तैयार कर रही है।
मतदाताओं में पैदा हुआ भ्रम
स्थानीय नागरिकों में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब पति कांग्रेस से और पत्नी अपक्ष के रूप में चुनाव लड़ रही हैं, तो वास्तव में किस पक्ष का समर्थन किसे मिलेगा?
बहुत से मतदाताओं का कहना है कि यह स्थिति जानबूझकर भ्रम पैदा करने वाली लगती है।
कुछ नागरिकों की प्रतिक्रिया में यह भी सुनाई दे रहा है:
“यदि कोई अपक्ष उम्मीदवार मैदान में है तो डर किस बात का? क्या पहली बार कोई पति-पत्नी अलग-अलग भूमिकाओं में चुनाव लड़ रहे हैं कि इतना बवाल मचा है?”
विपक्षी उम्मीदवारों में चिंता, नागरिकों में सवाल
रंजिता आगदारी का अपक्ष के रूप में मैदान में उतरना अन्य उम्मीदवारों की रणनीतियों को भी प्रभावित कर रहा है।
प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों में यह चिंता साफ दिखाई दे रही है कि दंपति की संयुक्त लोकप्रियता और मैदान में दोहरी उपस्थिति उनके वोट बैंक में सेंध लगा सकती है।
जनता का अंतिम फैसला ही लोकतंत्र की कसौटी
भ्रम और आरोपों के बीच एक बात स्पष्ट है—अंतिम फैसला घुग्घूस की जनता ही करेगी।
चुनाव चाहे पक्ष का हो या अपक्ष का, मतदाता जिस पर भरोसा करेंगे, वही विजयी होगा।
घुग्घूस की इस अनोखी चुनावी जंग ने न केवल शहर की राजनीति में गर्मी ला दी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या परिवार आधारित ‘डुअल पॉलिटिक्स’ लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करेगी या मतदाताओं को उलझाएगी?




