जनहित या चुनावी तमाशा—सवालों में घिरी राजनीति
(प्रणयकुमार बंडी)
वणी–घुग्घुस मार्ग के प्रभाग क्रमांक 03 में प्रस्तावित देसी शराब की नई दुकान ने खुलने से पहले ही घुग्घुस की राजनीति में भूचाल ला दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि यही इलाका पहले भी विवादों का केंद्र रह चुका है—डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पूर्णाकृति से महज़ कुछ दूरी पर लगी देशी शराब दुकान के खिलाफ लोटांगन आंदोलन, अर्धनग्न आंदोलन और कई उग्र प्रदर्शन हुए थे। जनता ने तब भी आवाज़ उठाई थी, और आज भी वही सवाल हवा में तैर रहा है—“ये दुकानें आखिर बंद क्यों नहीं होती?”
लेकिन इस बार विवाद का तापमान कुछ ज़्यादा ही तेज़ है। कारण साफ़ है—घुग्घुस नगर परिषद चुनाव 2025 सिर पर है!
ऐसे में हर पार्टी के नेता, स्वयंघोषित सामाजिक कार्यकर्ता, और कई ‘अचानक जागे’ चिंतक इस मुद्दे को कैश कराने की कतार में खड़े दिखाई दे रहे हैं। शराब दुकान का विरोध एकदम से “जनहित” बन गया है, मानो इस शहर की बाकी सारी समस्याएँ हल हो चुकी हों।
सवाल जनता पूछ रही है—पर जवाब देने कोई तैयार नहीं:
जब पहले वाली शराब दुकानों का विरोध हुआ, तब नेताओं ने क्या किया?
जो दुकानें सालों से चल रही हैं, उन्हें बंद कराने में नाकामी क्यों?
क्या नई दुकान का विरोध सिर्फ इसलिए कि चुनावी मंच तैयार हो सके?
क्या चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी “ठंडे बस्ते” में जाएगा, जैसा हमेशा होता आया है?
घुग्घुस की जनता यह भी जानना चाहती है कि अब जब मामला गरम है, तो पुलिस, एक्साइज विभाग, जिला प्रशासन और कलेक्टर की भूमिका क्या होगी? क्या ये विभाग नियमों के आधार पर ठोस कार्रवाई करेंगे, या राजनीतिक गर्मी ढलने का इंतज़ार करेंगे?
अभी तक प्रशासन की ओर से कोई कठोर रुख दिखाई नहीं देता। मगर नेताओं की बयानबाज़ी, फोटो-सेशन वाले विरोध और सोशल मीडिया के शोर से ऐसा जरूर लगता है कि घुग्घुस में शराब की दुकान से ज़्यादा शराब दुकान की राजनीति बिक रही है।
जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—
“ये विरोध सच में जनहित है, या फिर चुनाव के मौसम में उठा एक नया टोटका?”
आने वाला समय बता देगा कि घुग्घुस के नेता इस लड़ाई को जनता के लिए लड़ रहे हैं, या सिर्फ अपने चुनावी लाभ के लिए।




