Tuesday, May 12, 2026

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वर्षों का इंतज़ार, दो घंटे की राहत और फिर खुला पुल: घुग्घुस की राजनीति में “पुलिया” बनी जनभावनाओं का केंद्र

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस शहर में वर्षों से रेलवे गेट जाम की समस्या से जूझ रही जनता को आखिरकार राहत की एक किरण दिखाई देने लगी है। सोमवार, दिनांक 11 मई 2026 को घुग्घुस नगर परिषद के नियोजन, विकास व अर्थ सभापति रवीश विनय सिंग, बांधकाम सभापति रोशन परशुराम पाचारे, नगर सेवक सूरज कन्नूर, स्वीकृत नगर सेवक तौफीक शेख तथा अन्य जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में सुबह लगभग 11:50 बजे रेलवे उड्डाण पुल (पुलिया) का रिबन काटकर आम नागरिकों के लिए खोला गया।

इस दौरान पवन आगदारी, श्रीनिवास लक्काकुला, राहुल यदुवंशी, राकेश डिंडिगाला, उमेश गुप्ता, भीम यादव, अनिल ठाकुर, सावन मोरपाका, लड्डू चिल्का, हजर शेख सहित बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद रहे। पुल शुरू होते ही दुपहिया, तीन पहिया और चार पहिया वाहन चालकों ने राहत की सांस ली और लोगों ने इसे शहर के लिए बड़ी उपलब्धि बताया।

हालांकि यह खुशी ज्यादा देर कायम नहीं रह सकी। उद्घाटन के मात्र दो घंटे बाद ही दोपहर करीब 2 बजे महारेल के अधिकारियों ने सुरक्षा और तकनीकी परीक्षण का हवाला देते हुए पुल को फिर से बंद कर दिया। अधिकारियों का कहना था कि पुल का परीक्षण और कुछ तकनीकी कार्य अभी बाकी हैं तथा किसी भी संभावित दुर्घटना से बचने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था।

लेकिन मंगलवार, 12 मई 2026 की रात करीब 8:30 बजे पुल को दोबारा दुपहिया, तीन पहिया और चार पहिया वाहनों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद शहर ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों और जिलेभर के लोगों ने राहत महसूस करते हुए इस निर्णय का स्वागत किया।

“मदर्स डे गिफ्ट” बना पुल

नियोजन, विकास व अर्थ सभापति रवीश विनय सिंग ने इस पुल को “मदर्स डे गिफ्ट” बताते हुए कहा कि वर्षों से माताएं और परिवार रेलवे फाटक पर घंटों फंसे रहते थे। अब बच्चों को स्कूल आने-जाने में सुविधा होगी और भीषण गर्मी में लोगों को लंबे इंतजार से राहत मिलेगी।

2014 से शुरू हुआ संघर्ष, 2026 में भी अधूरापन

घुग्घुस शहर की जनता पिछले कई वर्षों से रेलवे गेट जाम की गंभीर समस्या से परेशान रही है। रेलवे फाटक लंबे समय तक बंद रहने के कारण विद्यार्थियों, मजदूरों, व्यापारियों, मरीजों और आम नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2014 के आसपास रेलवे उड्डाण पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

लेकिन विडंबना यह है कि एक दशक बीत जाने के बाद भी पुल का निर्माण कार्य पूरी तरह पूर्ण नहीं हो पाया। कई बार निरीक्षण, घोषणाएं और आश्वासन दिए गए, मगर जनता को इंतजार ही करना पड़ा। ऐसे में अब पुल का आंशिक रूप से खुलना लोगों के लिए राहत जरूर है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर वर्षों तक जनता को बुनियादी सुविधा के लिए क्यों संघर्ष करना पड़ा।

राजनीति और जनभावनाओं का नया केंद्र

घुग्घुस की यह पुलिया अब केवल एक निर्माण परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है। सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि इसे जनता की जीत बता रहे हैं, वहीं आम नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि यदि जनदबाव और लगातार आवाजें न उठतीं, तो क्या यह पुल शुरू हो पाता?

शहरवासियों का कहना है कि यह पुल केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि घुग्घुस की वर्षों पुरानी पीड़ा, संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक बन चुका है। अब लोगों की मांग है कि अधूरे कार्यों को जल्द पूरा कर पुल को पूरी क्षमता के साथ स्थायी रूप से चालू किया जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की असुविधा या दुर्घटना की स्थिति पैदा न हो।

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