प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस शहर में वर्षों से रेलवे गेट जाम की समस्या झेल रही जनता को सोमवार, दिनांक 11 मई 2026 को आखिरकार कुछ घंटों के लिए राहत की सांस मिली। सुबह लगभग 11:50 बजे घुग्घुस नगर परिषद के नियोजन, विकास व अर्थ सभापति रवीश विनय सिंग, बांधकाम सभापति रोशन परशुराम पाचारे, नगर सेवक सूरज कन्नूर, स्वीकृत नगर सेवक तौफीक शेख एवं अन्य पदाधिकारियों की उपस्थिति में रेलवे उड्डाण पुल (पुलिया) का रिबन काटकर आम जनता के लिए मार्ग खोल दिया गया।
पुल खुलते ही दुपहिया, चारपहिया और छोटे मालवाहक वाहन चालकों में खुशी की लहर दौड़ गई। लंबे समय से रेलवे फाटक पर घंटों फंसने वाली जनता ने इसे “यातना से राहत” बताया। भीषण गर्मी में रोजाना जाम से जूझ रहे विद्यार्थियों, मजदूरों, व्यापारियों और मरीजों को लगा कि अब शहर की किस्मत बदलने वाली है।
लेकिन यह राहत महज दो घंटे ही टिक सकी। दोपहर लगभग 2 बजे के आसपास महारेल (रेलवे) अधिकारियों ने पुल को पुनः बंद कर दिया। कारण बताया गया कि पुल की टेस्टिंग प्रक्रिया अभी जारी है और किसी भी प्रकार की संभावित दुर्घटना या अनहोनी से बचने के लिए यातायात रोकना आवश्यक है।
यहीं से शुरू हुआ राजनीतिक और प्रशासनिक सवालों का तूफान।
क्या बिना पूर्ण अनुमति के खोला गया पुल?
सबसे बड़ा प्रश्न यही उठ रहा है कि यदि पुल की टेस्टिंग प्रक्रिया अधूरी थी, तो जनता के लिए इसे खोला किसके आदेश पर गया? क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अनुमति के बिना जनता के दबाव और राजनीतिक संदेश देने के लिए पुल शुरू किया? यदि किसी प्रकार की दुर्घटना हो जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि किसी अधूरे अथवा परीक्षणाधीन सार्वजनिक निर्माण को बिना अंतिम तकनीकी अनुमति के चालू किया गया हो, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी विषय बन सकता है। विशेष रूप से तब, जब रेलवे, महारेल, PWD, MIRDC या अन्य संबंधित विभागों की अंतिम सुरक्षा मंजूरी शेष हो।
सत्ता पक्ष में सबकुछ ठीक नहीं?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा नगर परिषद के नगराध्यक्ष, उपनगराध्यक्ष, अन्य सभापति, कई नगर सेवकों और विपक्षी नेताओं की अनुपस्थिति को लेकर हो रही है। खास बात यह रही कि दो दिन पहले विधायक किशोर जोरगेवार के पुल निरीक्षण के दौरान जो चेहरे सक्रिय दिखाई दिए थे, वही चेहरे पुल खोलने के समय नदारद दिखे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सत्ता पक्ष के भीतर अलग-अलग गुट सक्रिय हो चुके हैं, जो जनता के बीच “श्रेय की राजनीति” लड़ रहे हैं। पुल का उद्घाटन ऐसे दिन होना, जिस दिन एक प्रमुख विपक्षी नेता का जन्मदिन था और पूरे शहर में उनके बैनर लगे थे, लेकिन वे स्वयं कार्यक्रम से दूर रहे — इसने भी कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
लोग पूछ रहे हैं कि 25 वर्षों से लंबित इस संघर्ष का असली श्रेय किसे मिलेगा? जनता को राहत दिलाने वाले जनप्रतिनिधियों को, निरीक्षण करने वाले विधायक को, वर्षों तक आंदोलन करने वालों को या फिर उन प्रशासनिक विभागों को जिनके कारण परियोजना अब तक अधूरी पड़ी है?
“मदर्स डे गिफ्ट” या राजनीतिक संदेश?
नियोजन, विकास व अर्थ सभापति रवीश विनय सिंग ने इस निर्णय को “मदर्स डे गिफ्ट” बताते हुए कहा कि कुछ माताओं ने उनसे निवेदन किया था कि युवाओं को इसलिए चुना गया है ताकि वे जनता के लिए काम करें। उनके अनुसार, पुल शुरू होने से बच्चों और परिवारों को गर्मी और जाम से राहत मिलेगी।
वहीं बांधकाम सभापति रोशन परशुराम पाचारे ने कहा कि यह निर्णय पूरी तरह जनहित में लिया गया। उनका कहना था कि जिस पुल का काम दो वर्षों में पूरा होना चाहिए था, उसके एक हिस्से को पूरा होने में ही पांच वर्ष लग गए और दूसरा हिस्सा अब भी अधूरा है। उन्होंने दावा किया कि जाम और अव्यवस्था के कारण अब तक 20 से 25 लोगों की जान जा चुकी है।
2014 से 2026: जनता इंतज़ार में, राजनीति सक्रिय
घुग्घुस रेलवे उड्डाण पुल की कहानी केवल एक अधूरे निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुस्ती, राजनीतिक श्रेयवाद और जनता की पीड़ा का प्रतीक बन चुकी है।
वर्ष 2014 के आसपास शुरू हुई इस परियोजना से उम्मीद थी कि शहर को रेलवे गेट जाम से स्थायी मुक्ति मिलेगी। लेकिन 2026 आ जाने के बाद भी पुल पूरी तरह तैयार नहीं हो सका। 09 मई 2026 को विधायक किशोर जोरगेवार द्वारा पुल का निरीक्षण किए जाने के कुछ ही घंटों बाद भारी वाहनों द्वारा पुल की टेस्टिंग किए जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे।
अब सवाल यह है कि क्या जनता की पीड़ा को देखकर कुछ जनप्रतिनिधियों ने “जनहित” के नाम पर साहसिक निर्णय लिया, या फिर यह सब राजनीतिक संदेश देने और श्रेय लेने की जल्दबाजी थी?
घुग्घुस की जनता फिलहाल एक ही बात कह रही है —
“हमें राजनीति नहीं, सुरक्षित और स्थायी समाधान चाहिए।”




