प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : शहर में स्वच्छता व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नगर परिषद क्षेत्र में कचरा संकलन के लिए पर्याप्त वाहन उपलब्ध न होने का मुद्दा सामने आने के बाद सत्तापक्ष की ओर से निजी कंपनी की CSR निधि से नई कचरा गाड़ियां उपलब्ध कराने की पहल की गई। इसी क्रम में 07 मई 2026 को लॉयड्स कंपनी के माध्यम से बैटरी से चलने वाली दो चारपहिया कचरा गाड़ियां नगर परिषद को सौंप दी गईं।
लोकार्पण कार्यक्रम में सत्ता पक्ष के पदाधिकारी और कंपनी के अधिकारी मौजूद रहे, लेकिन इस पूरे आयोजन के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सरकार द्वारा पहले से ही नगर परिषद को अनेक वाहन उपलब्ध कराए गए थे, तो वे आज कबाड़ में कैसे तब्दील हो गए?
सूत्रों के अनुसार नगर परिषद के पास रिक्शा, ढक्कल गाड़ी, इलेक्ट्रिक रिक्शा, टाटा एस सहित कई वाहन उपलब्ध थे। आरोप है कि नियमित मेंटेनेंस और जवाबदेही के अभाव में ये वाहन धीरे-धीरे अनुपयोगी होते गए। अब जनता पूछ रही है कि सरकारी संपत्ति को भंगार बनने देने का जिम्मेदार आखिर कौन है?
क्या इस मामले में संबंधित अधिकारियों की लापरवाही थी या फिर ठेकेदारों की मिलीभगत? यदि करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति रखरखाव के अभाव में नष्ट हुई है, तो क्या केवल फाइलों में नोटिंग होगी या वास्तविक कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई भी की जाएगी? और सबसे अहम सवाल — कार्रवाई करेगा कौन?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि अचानक CSR निधि से नई गाड़ियां उपलब्ध कराने की मांग के पीछे केवल स्वच्छता का मुद्दा है या फिर शहर के अन्य ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने की रणनीति?
शहर की मुख्य सड़क पर बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था, बस स्टॉप चौक के ट्रैफिक सिग्नल, पानधन मार्ग का अधूरा पक्का निर्माण, किसानों की समस्याएं, बढ़ता प्रदूषण और नागरिक सुविधाओं की अनदेखी जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि “नई गाड़ियों” का प्रचार कर असली मुद्दों को पीछे धकेलने की कोशिश हो रही है।
अब निगाहें आज होने वाली बैठक पर टिकी हैं। जनता यह देखना चाहती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने होकर जवाबदेही तय करेंगे या फिर एक-दूसरे पर औपचारिक आरोप लगाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल देंगे।
क्या मीडिया के सामने पुराने वाहनों की खरीदी, मेंटेनेंस और कबाड़ में तब्दील होने की पूरी सच्चाई आएगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई की मांग उठेगी? या फिर “चोर-चोर मौसेरे भाई” वाली राजनीति के बीच पूरा मामला दबा दिया जाएगा?
फिलहाल, शहर की जनता जवाब चाहती है — नई गाड़ियां तो आ गईं, लेकिन पुरानी सरकारी संपत्ति का हिसाब कौन देगा?




