दिसंबर 1946 में भारत की संविधान सभा ने अपना कार्य आरंभ किया। इसका उद्देश्य था – स्वतंत्र भारत के लिए एक नया संविधान तैयार करना। यह सभा ब्रिटिश सरकार की कैबिनेट मिशन योजना के तहत गठित की गई थी। हालांकि, इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मुस्लिम लीग ने इस संविधान सभा का बहिष्कार कर दिया।
मुस्लिम लीग का बहिष्कार और पाकिस्तान की मांग
मुस्लिम लीग, जिसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना थे, उन्हों ने संविधान सभा का यह कहते हुए बहिष्कार किया कि यह सभा भारत के मुसलमानों के हितों की रक्षा नहीं कर पाएगी। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने “दो राष्ट्र सिद्धांत” के आधार पर अलग मुस्लिम राष्ट्र – पाकिस्तान – की मांग को और मुखर कर दिया। उनका मानना था कि मुसलमान एक अलग “कौमी इकाई” हैं और उन्हें एक अलग देश में बसने का अधिकार मिलना चाहिए।
लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन
जब भारत में राजनीतिक स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी, तब ब्रिटेन ने लॉर्ड वेवेल को वायसराय के पद से हटाकर मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया। माउंटबेटन के आने के बाद भारत के विभाजन की प्रक्रिया ने निर्णायक मोड़ ले लिया।
माउंटबेटन की भूमिका
लॉर्ड माउंटबेटन ने यह महसूस किया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि संयुक्त भारत का विचार अब व्यावहारिक नहीं रह गया है। उन्होंने भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया और जल्द से जल्द सत्ता के हस्तांतरण की योजना पर काम करना शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप 3 जून 1947 को भारत के विभाजन की घोषणा हुई और 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान, दो स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए।
संविधान सभा की शुरुआत से ही देश के भविष्य को लेकर मतभेद उभरने लगे थे। मुस्लिम लीग का बहिष्कार और पाकिस्तान की मांग उस विभाजन की नींव बनी, जिसने उपमहाद्वीप का इतिहास ही बदल दिया। लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक रही, जिनकी नीति ने विभाजन को एक अनिवार्य वास्तविकता बना दिया।
यह घटनाक्रम आज भी भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्याय के रूप में देखा जाता है।




