29 मई इतिहास में एक ऐसी तारीख है, जिसे मानव साहस, दृढ़ संकल्प और अटूट इच्छाशक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। आज ही के दिन, वर्ष 1953 में, न्यूजीलैंड के पर्वतारोही सर एडमंड हिलेरी और नेपाली शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट (सागरमाथा) पर पहली बार सफलतापूर्वक चढ़ाई कर, इतिहास रच दिया।
माउंट एवरेस्ट: एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य
माउंट एवरेस्ट, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 8,848.86 मीटर (29,031.7 फीट) है, हिमालय की महाशृंखला में स्थित है और इसे दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता है। यह नेपाल और चीन (तिब्बत) की सीमा पर स्थित है। दशकों तक एवरेस्ट को अपराजेय माना गया। कई प्रयास असफल रहे और अनेक पर्वतारोहियों ने अपनी जान तक गंवाई।
ऐतिहासिक चढ़ाई
ब्रिटिश पर्वतारोहण अभियान के तहत 1953 में एक दल माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के मिशन पर निकला। इस अभियान की अगुवाई जॉन हंट कर रहे थे। अभियान के दो प्रमुख सदस्य – एडमंड हिलेरी, एक मध्यमवर्गीय मधुमक्खी पालक और पर्वतारोही, और तेनजिंग नोर्गे, एक अनुभवी शेरपा गाइड – ने 28 मई की रात साउथ कोल में अपना आखिरी शिविर लगाया।
29 मई 1953 की सुबह, लगभग 11:30 बजे, उन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा और वहां पहली बार मानव उपस्थिति दर्ज की। यह उपलब्धि केवल पर्वतारोहण के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि मानव आत्मबल और जिजीविषा की जीत के रूप में दर्ज हुई।
एक साझा गौरव
हालांकि शुरुआत में इस बात को लेकर विवाद था कि चोटी पर सबसे पहले कौन पहुंचा, लेकिन हिलेरी और नोर्गे दोनों ने सदैव यही कहा कि उन्होंने साथ मिलकर चोटी पर कदम रखा और यह एक साझा उपलब्धि थी।
वैश्विक सम्मान
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए एडमंड हिलेरी को ब्रिटिश महारानी द्वारा नाइट की उपाधि से नवाजा गया, जबकि तेनजिंग नोर्गे को भी अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और भारत तथा नेपाल दोनों में उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए।
29 मई न केवल पर्वतारोहण के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है, बल्कि यह दिन यह भी याद दिलाता है कि कठिन से कठिन लक्ष्य भी समर्पण, साहस और टीमवर्क से हासिल किए जा सकते हैं। आज जब हम माउंट एवरेस्ट की बात करते हैं, तो हिलेरी और नोर्गे के नाम श्रद्धा और गर्व से लिए जाते हैं – क्योंकि उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया।
क्या आप जानते हैं?
तेनजिंग नोर्गे के पास पर्वतारोहण का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था, लेकिन उनका अनुभव और हिमालयी क्षेत्रों की समझ बेजोड़ थी। वे 1953 के पहले भी 6 बार एवरेस्ट अभियान में हिस्सा ले चुके थे।




