7/12, नमूना 8-अ, NA आदेश, लेआउट और निर्माण अनुमति की जांच की मांग; प्रस्तावित कोयला अधिग्रहण के बीच खेतों में नए निर्माणों ने बढ़ाई चिंता
प्रणयकुमार बंडी
चंद्रपुर : यवतमाल जिले की वणी तहसील के ग्रामीण क्षेत्रों में शिवनी, चिंचोली और साखरा गांवों में कथित प्लॉटिंग और भूमि के अकृषक (NA) उपयोग को लेकर अब प्रशासनिक पारदर्शिता और राजस्व प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ जमीनों को NA होने का दावा करते हुए प्लॉटिंग अथवा निर्माण गतिविधियां आगे बढ़ाई जा रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि संबंधित भूमि का वास्तविक भूमि उपयोग क्या है और क्या प्रत्येक मामले में निर्धारित राजस्व एवं स्थानीय निकाय नियमों का पालन किया गया है?

NA का दावा, लेकिन दस्तावेज कहां हैं?
किसी जमीन को अकृषक उपयोग में लाने के मामले में केवल 7/12 पर नाम या जमीन का व्यवहारिक इस्तेमाल पर्याप्त नहीं माना जा सकता। संबंधित भूमि के 7/12 उतारे, 8-अ, NA आदेश, NA के लिए प्रस्तुत आवेदन, सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी, स्वीकृत NA उपयोग, स्वीकृत क्षेत्रफल, मंजूर नक्शा/लेआउट, NA आकारणी अथवा लागू शुल्क, वर्तमान Zoning/भूमि उपयोग तथा आवश्यक बांधकाम या विकास अनुमति जैसे दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण है।
यदि किसी जमीन पर प्लॉटिंग या निर्माण किया जा रहा है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित जमीन का स्वीकृत उपयोग क्या है, लेआउट किस प्राधिकरण ने मंजूर किया है और निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई है या नहीं।
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन जमीनों को NA बताया जा रहा है, वहां स्वीकृत लेआउट के अनुरूप आवश्यक विकास कार्य वास्तव में हुए हैं या नहीं। यदि जमीन का NA उपयोग स्वीकृत है, तो उसके आधार पर किए जा रहे विकास और निर्माण की वैधानिक स्थिति क्या है—इसकी मौके पर जांच जरूरी है।

खेत की जमीन पर प्लॉटिंग और रजिस्ट्री का आधार क्या?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन के रिकॉर्ड और वास्तविक उपयोग के बीच संभावित अंतर को लेकर है। यदि कोई जमीन अभी भी कृषि उपयोग में दर्ज है, तो उस पर प्लॉटिंग, रास्ते, निर्माण या अन्य गैर-कृषि गतिविधियां किस अनुमति के आधार पर की जा रही हैं?
इसी तरह, यदि खेत की जमीन के संबंध में नमूना 8-अ अथवा अन्य राजस्व दस्तावेजों के आधार पर व्यवहार/रजिस्ट्री हो रही है, तो संबंधित दस्तावेजों और भूमि उपयोग की स्थिति की जांच आवश्यक है।
किस जमीन का NA आदेश किस अधिकारी ने जारी किया? किस तारीख को जारी किया? कितना क्षेत्र स्वीकृत किया गया? किस उपयोग के लिए अनुमति दी गई? और क्या मौके पर वही उपयोग हो रहा है? इन सवालों के जवाब संबंधित रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकते हैं।

6 अक्टूबर से रजिस्ट्री बंद होने की चर्चा
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, 6 अक्टूबर 2026 से शिवनी, चिंचोली और साखरा क्षेत्र की कुछ जमीनों की रजिस्ट्री/दस्तावेज पंजीयन प्रक्रिया को लेकर रोक या सतर्कता बरते जाने की चर्चा है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक आदेश सार्वजनिक रूप से सामने आया है या नहीं, यह संबंधित विभाग से स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
यदि वास्तव में पंजीयन पर रोक अथवा कोई प्रशासनिक निर्देश जारी हुआ है, तो उसका आदेश क्रमांक, तारीख, लागू क्षेत्र और कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। वहीं यदि ऐसी कोई रोक नहीं है, तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट कर अफवाहों पर विराम लगाना चाहिए।

कोयला अधिग्रहण के बीच खेतों में नए निर्माणों ने बढ़ाई चिंता
मामले को और गंभीर बनाता है वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) के वणी क्षेत्र में मुंगोली–निरगुडा डीप ओपनकास्ट कोयला खदान के उत्तरी विस्तार से जुड़ा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण।
31 जुलाई 2026 को कोयला मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना क्रमांक S.O. 4252(E) के तहत Coal Bearing Areas (Acquisition and Development) Act, 1957 की धारा 7(1) के अंतर्गत शिवनी, चिंचोली और साखरा क्षेत्र की लगभग 295 हेक्टेयर (728.94 एकड़) भूमि के अधिग्रहण की मंशा जाहिर की गई है। इसमें शिवनी की लगभग 117.36 हेक्टेयर, चिंचोली की 173.18 हेक्टेयर और साखरा की 4.46 हेक्टेयर भूमि शामिल बताई गई है।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसी अधिसूचना अपने आप में अंतिम अधिग्रहण आदेश नहीं है। अधिग्रहण प्रक्रिया में संबंधित हितधारकों की आपत्तियों और दावों की जांच की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।

खेतों में एक जैसी संरचनाएं—जांच का असली मुद्दा क्या?
स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र में 8×8, 8×10 और 10×12 फीट जैसी छोटी संरचनाएं अथवा कथित अस्थायी मकान दिखाई दे रहे हैं। कुछ संरचनाओं के एक जैसी बनावट में होने की भी चर्चा है।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और मौके की जांच आवश्यक है। लेकिन यदि प्रशासन के संज्ञान में ऐसे नए निर्माण आए हैं, तो जांच के कुछ बुनियादी सवाल स्पष्ट हैं—- निर्माण वास्तव में कब किया गया?
– अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने से पहले या बाद में निर्माण हुआ?
– संबंधित निर्माण का राजस्व रिकॉर्ड में उल्लेख है या नहीं?
– ग्राम पंचायत स्तर पर कोई अनुमति, कर रिकॉर्ड या अन्य दस्तावेज उपलब्ध हैं या नहीं?
– निर्माण से संबंधित बिजली, पानी अथवा अन्य वैध अभिलेख कब जारी हुए?
– पुराने उपग्रह चित्रों अथवा उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से निर्माण की स्थिति की पुष्टि की जा सकती है या नहीं?
– अधिग्रहण और मुआवजा निर्धारण में ऐसे निर्माणों की वैधता किस आधार पर तय की जाएगी?
इन सवालों की निष्पक्ष जांच होने पर यह स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित संरचनाएं पुरानी और वास्तविक उपयोग वाली हैं या हाल में बनाई गई हैं।

तहसील से ग्राम पंचायत तक जवाबदेही तय हो
मामले में केवल एक विभाग की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यकता पड़ने पर तहसीलदार, संबंधित राजस्व अधिकारी/पटवारी, ग्राम पंचायत के ग्राम सचिव, सरपंच, संबंधित विकास अधिकारी तथा भूमि उपयोग एवं निर्माण अनुमति से जुड़े अधिकारियों के स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच की जानी चाहिए।
प्रशासन को प्रत्येक संबंधित सर्वे नंबर की 7/12, 8-अ, फेरफार नोंद, NA आदेश, स्वीकृत उपयोग, लेआउट, आकारणी/शुल्क, निर्माण अनुमति और मौके की स्थिति का मिलान करना चाहिए।
यदि रिकॉर्ड और जमीन की वास्तविक स्थिति में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं यदि सभी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है, तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, सरकारी निगरानी का भी
शिवनी, चिंचोली और साखरा का मामला केवल कथित प्लॉटिंग या NA का विषय नहीं है। एक ओर भूमि उपयोग परिवर्तन और निर्माण अनुमति की प्रक्रिया है, तो दूसरी ओर प्रस्तावित कोयला अधिग्रहण और संभावित मुआवजा निर्धारण का प्रश्न है।
ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल है—क्या रिकॉर्ड पहले से पारदर्शी और अद्यतन हैं, या जमीन पर गतिविधि बढ़ने के बाद रिकॉर्ड की जांच शुरू होगी?
यदि कोई अनियमितता नहीं है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए। यदि अनियमितता है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वास्तविक भूमिधारकों और वास्तविक संपत्तियों के अधिकार सुरक्षित रहें तथा सरकारी मुआवजे का लाभ किसी अपात्र या गलत दावे को न मिले।
अब निगाहें वणी प्रशासन की कार्रवाई पर हैं—क्या शिवनी, चिंचोली और साखरा की जमीनों का सर्वे नंबरवार रिकॉर्ड और मौके की स्थिति जांची जाएगी, या यह पूरा मामला केवल फाइलों तक सीमित रह जाएगा?




