प्रणयकुमार बंडी
यवतमाल/चंद्रपुर : वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) के वणी क्षेत्र में मुंगोली–निरगुडा डीप ओपनकास्ट कोयला खदान के उत्तरी विस्तार के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण अब केवल जमीन और मुआवजे का मामला नहीं रह गया है। अधिग्रहण की प्रक्रिया के बीच खेतों में अचानक दिखाई देने वाली एक जैसी आकार की कच्ची निर्माणों की कतारों ने प्रशासनिक निगरानी, भूमि रिकॉर्ड और संभावित मुआवजा दावों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

31 जुलाई 2026 को कोयला मंत्रालय ने राजपत्र में अधिसूचना क्रमांक S.O. 4252(E) जारी करते हुए Coal Bearing Areas (Acquisition and Development) Act, 1957 की धारा 7(1) के तहत वणी क्षेत्र के शिवनी, चिंचोली और साखरा गांवों में कुल लगभग 295 हेक्टेयर यानी 728.94 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की मंशा जाहिर की है। अधिसूचना में शिवनी की 117.36 हेक्टेयर, चिंचोली की 173.18 हेक्टेयर और साखरा की 4.46 हेक्टेयर भूमि शामिल है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अंतिम अधिग्रहण आदेश नहीं, बल्कि अधिग्रहण की मंशा की अधिसूचना है। कानून की धारा 8 के तहत संबंधित हितधारकों को आपत्ति दर्ज करने का अधिकार है और सक्षम प्राधिकारी को उन आपत्तियों पर सुनवाई एवं आवश्यक जांच करनी होती है।
लेकिन इसी प्रक्रिया के बीच खेतों में तेजी से खड़े होते कथित अस्थायी मकानों को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या ये निर्माण वास्तव में रहने के लिए हैं, या भविष्य में मुआवजे का दावा मजबूत करने की कोशिश?

खेतों में एक जैसी बनावट वाले मकान क्यों?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र में 8×8, 8×10 और 10×12 फीट के छोटे-छोटे स्लैब अथवा कच्चे मकान बनाए जा रहे हैं। कथित तौर पर कई निर्माण एक जैसी बनावट के हैं और कतार में दिखाई देते हैं। यदि ये निर्माण वास्तव में हाल के महीनों में किए गए हैं, तो जांच का पहला सवाल होना चाहिए कि निर्माण कब हुआ? क्या इनके निर्माण से पहले संबंधित भूमि का मौके पर पंचनामा हुआ था? क्या राजस्व रिकॉर्ड में इन निर्माणों का कोई उल्लेख है? क्या निर्माण की तारीख निर्धारित करने के लिए पुराने उपग्रह चित्र, ग्राम पंचायत रिकॉर्ड, बिजली कनेक्शन, पानी कनेक्शन, कर रिकॉर्ड या अन्य उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की गई? और सबसे महत्वपूर्ण—अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद बने किसी नए निर्माण की स्थिति मुआवजा निर्धारण में किस आधार पर तय की जाएगी? इन सवालों का जवाब केवल अफवाहों को खत्म नहीं करेगा, बल्कि वास्तविक लाभार्थियों और संभावित फर्जी दावों के बीच अंतर करने में भी मदद कर सकता है।
295 हेक्टेयर के अधिग्रहण में सरकारी जमीन भी शामिल
कोयला मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार कुल 295 हेक्टेयर क्षेत्र में 260.06 हेक्टेयर tenancy land और 34.94 हेक्टेयर government land दर्ज है। शिवनी में 117.36, चिंचोली में 173.18 और साखरा में 4.46 हेक्टेयर भूमि अधिसूचना के दायरे में है। इससे एक और गंभीर प्रशासनिक प्रश्न सामने आता है—यदि अधिसूचना की सीमा में सरकारी जमीन, आबादी क्षेत्र, सड़क और नाले जैसे हिस्से भी दर्ज हैं, तो इन जमीनों पर नए निर्माणों की अनुमति या अनदेखी किस स्तर पर हुई? क्या संबंधित राजस्व अधिकारियों ने नियमित स्थल निरीक्षण किया? क्या ग्राम पंचायतों ने निर्माणों का रिकॉर्ड रखा? क्या ग्रामसेवक अथवा संबंधित स्थानीय अधिकारी को नए निर्माणों की जानकारी थी? यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं थी तो प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र में प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

‘तीन गुना मुआवजे’ के दावे की भी जांच जरूरी
स्थानीय चर्चाओं में यह दावा सामने आ रहा है कि कुछ लोग ग्रामीणों को कथित रूप से यह भरोसा दिला रहे हैं कि नए मकानों के बदले WCL से कई गुना मुआवजा मिलेगा। कहीं ढाई लाख रुपये की जगह आठ लाख रुपये या उससे अधिक मिलने की बात कही जाने की चर्चा है। यह दावा फिलहाल स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है। लेकिन यदि वास्तव में किसी व्यक्ति या समूह द्वारा ग्रामीणों से ऐसा आश्वासन देकर पैसे लिए जा रहे हैं, तो यह प्रशासन और पुलिस के लिए अलग जांच का विषय बन सकता है।
किस आधार पर मुआवजे की राशि बताई जा रही है? क्या कोई अधिकृत मुआवजा दर जारी हुई है? क्या मकान की उम्र, भूमि का स्वामित्व, निर्माण की वैधता और अधिग्रहण की कट-ऑफ स्थिति निर्धारित हो चुकी है? यदि नहीं, तो ग्रामीणों को निश्चित राशि का आश्वासन कौन और किस अधिकार से दे रहा है?
100 रुपये के स्टांप पेपर पर ‘भोगवटदार’?
सबसे संवेदनशील आरोप कथित रूप से ग्रामीणों से 100 रुपये के स्टांप पेपर पर ‘भोगवटदार’ के रूप में हस्ताक्षर कराने और बिना स्पष्ट सर्वे नंबर के लेनदेन से जुड़ा है। स्थानीय चर्चा के अनुसार कुछ मकानों की कथित नोटरी बिक्री ढाई से साढ़े तीन लाख रुपये तक में होने की बात सामने आ रही है और कुछ मामलों में अग्रिम राशि लेने की भी चर्चा है। यदि ऐसा हो रहा है तो ग्रामीणों के सामने सीधा सवाल है— क्या केवल स्टांप पेपर या नोटरी दस्तावेज से किसी व्यक्ति को भूमि का वैध मालिकाना हक मिल जाता है? इसका जवाब दस्तावेजों की प्रकृति, मूल भूमि रिकॉर्ड, स्वामित्व और लागू राजस्व कानूनों की जांच के बाद ही दिया जा सकता है। इसलिए किसी भी ग्रामीण को केवल मौखिक आश्वासन या निजी कागज के आधार पर जमीन अथवा मकान खरीदने-बेचने से पहले स्वतंत्र कानूनी जांच करानी चाहिए।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल: निर्माण कब हुआ? पूरे मामले की निष्पक्ष जांच में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज निर्माण की तारीख हो सकती है। प्रशासन यदि पुराने राजस्व रिकॉर्ड, ग्राम पंचायत रिकॉर्ड, बिजली कनेक्शन, संपत्ति कर, आधारभूत सुविधाओं के रिकॉर्ड और उपलब्ध उपग्रह चित्रों की तुलना करे तो यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कौन-से मकान पहले से मौजूद थे और कौन-से निर्माण हाल में हुए।

इसी के साथ प्रत्येक निर्माण का—
- सर्वे नंबर/गट नंबर, – भूमि की प्रकृति, – वर्तमान रिकॉर्डेड मालिक,
- कब्जाधारी, – निर्माण की अनुमानित तारीख, – निर्माण की अनुमति, – बिजली/पानी कनेक्शन, – ग्राम पंचायत रिकॉर्ड, – तथा अधिग्रहण सीमा से संबंध का अलग-अलग सत्यापन किया जाना चाहिए।
WCL की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
WCL केवल अधिग्रहण करने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि प्रस्तावित खनन परियोजना की जमीन संबंधी प्रक्रिया में प्रमुख हितधारक है। ऐसे में सवाल उठता है कि अधिग्रहण क्षेत्र की पहचान होने के बाद भूमि की वर्तमान स्थिति का बेसलाइन रिकॉर्ड कब तैयार किया गया? क्या WCL के राजस्व/भूमि विभाग ने अधिसूचना क्षेत्र का संयुक्त स्थल निरीक्षण किया? क्या अधिसूचना से पहले और बाद की स्थिति का तुलनात्मक रिकॉर्ड उपलब्ध है? क्या प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र में नए निर्माणों की वीडियोग्राफी या जियो-टैगिंग की गई? क्या प्रत्येक संरचना की स्थिति दर्ज की गई? यदि नए निर्माण वास्तव में अधिग्रहण क्षेत्र में बढ़ रहे हैं, तो WCL और संबंधित प्रशासन को इस स्थिति की जानकारी कब मिली? और यदि जानकारी मिलने के बाद भी निर्माण जारी रहे, तो रोकथाम की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कोयला मंत्रालय स्वयं बताता है कि CBA Act के तहत धारा 4 के बाद धारा 7(1) के जरिए अधिग्रहण की मंशा की अधिसूचना जारी होती है और आगे आपत्तियों की प्रक्रिया रहती है। इसलिए अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी रखने के लिए जमीन की स्थिति का सही रिकॉर्ड अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ग्राम पंचायत और राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के घेरे में
यदि कृषि भूमि पर नए निर्माण किए गए हैं, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि संबंधित निर्माणों के संबंध में कौन-कौन से स्थानीय एवं राजस्व नियम लागू होते हैं और क्या कोई अनुमति ली गई थी।
सवाल सीधे हैं— क्या कृषि भूमि पर इन निर्माणों की अनुमति ली गई? क्या ग्राम पंचायत के पास इन मकानों का कोई रिकॉर्ड है? क्या निर्माण के समय ग्रामसेवक अथवा संबंधित अधिकारी ने स्थल निरीक्षण किया? यदि सरकारी या नजूल/पट्टे की जमीन पर निर्माण हुआ है, तो भूमि का कब्जा किस आधार पर दिया गया? क्या किसी अधिकारी ने निर्माण रोकने या हटाने की कार्रवाई शुरू की? और यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका कारण क्या है?
यदि किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि की मिलीभगत का आरोप लगाया जाता है, तो उसकी पुष्टि केवल दस्तावेजी जांच और स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है। इसलिए बिना जांच किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय भूमि रिकॉर्ड, अनुमति पत्र, पंचनामा और निर्माण की तारीख सामने लाना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
पुराने मुंगोली मामले की चर्चा भी जांच योग्य
स्थानीय स्तर पर लगभग 15 वर्ष पुराने मुंगोली क्षेत्र के एक कथित मामले का भी हवाला दिया जा रहा है, जिसमें तत्कालीन सरपंच और उनके साथियों पर निर्माणों के माध्यम से WCL से अधिक मुआवजा लेने के आरोप लगाए जाने की चर्चा है। यदि ऐसा कोई पुराना प्रकरण सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है, तो उसके दस्तावेजों को सामने लाना उपयोगी होगा। क्या उस मामले में कोई जांच हुई थी? क्या कोई FIR या विभागीय कार्रवाई हुई? क्या किसी को मुआवजा मिला? क्या उस मामले में कोई न्यायिक अथवा प्रशासनिक निष्कर्ष निकला? पुराने रिकॉर्ड की जांच वर्तमान स्थिति को समझने में प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

‘मुआवजा लूट’ कहना अभी जल्दबाजी, लेकिन जांच टालना भी उचित नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल नए दिखाई देने वाले मकानों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुआवजा हड़पने की साजिश हो रही है। लेकिन दूसरी ओर, यदि प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र में बड़ी संख्या में एक जैसे नए निर्माण अचानक दिखाई दे रहे हैं और उनके साथ जमीन की खरीद-बिक्री, नोटरी दस्तावेज तथा मुआवजे के आश्वासन की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, तो इसे नजरअंदाज करना भी प्रशासनिक रूप से उचित नहीं होगा। सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित कर रहा है?
सक्षम प्राधिकारी की परीक्षा अब शुरू
अधिसूचना के अनुसार Coal Controller को CBA Act की धारा 3 के तहत सक्षम प्राधिकारी नियुक्त किया गया है। धारा 8 के तहत अधिग्रहण पर आपत्तियां प्राप्त करना, संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना और आवश्यक जांच के बाद अपनी रिपोर्ट एवं सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
यही वह बिंदु है जहां पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता की परीक्षा होगी।
क्या वास्तविक भूमि मालिक और वास्तविक कब्जाधारी की पहचान होगी? क्या पुराने और नए निर्माणों में अंतर किया जाएगा? क्या सरकारी भूमि पर बने निर्माणों की अलग जांच होगी? क्या कथित रूप से हाल में बनाए गए मकानों का रिकॉर्ड अधिग्रहण से पहले की स्थिति से मिलाया जाएगा? क्या किसी भी प्रकार के फर्जी दस्तावेज, गलत दावे या बिचौलियों की भूमिका सामने आने पर कार्रवाई होगी? और सबसे अहम—क्या मुआवजे की प्रक्रिया में केवल पात्र और वास्तविक हितधारकों को ही लाभ मिलेगा?

अब चाहिए ‘कागज नहीं, जमीन पर जांच’
शिवनी, चिंचोली और साखरा में प्रस्तावित 295 हेक्टेयर अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। जरूरत किसी सनसनीखेज निष्कर्ष की नहीं, बल्कि संयुक्त और स्वतंत्र सत्यापन की है। जिला प्रशासन, राजस्व विभाग, संबंधित ग्राम पंचायतें, WCL और सक्षम प्राधिकारी यदि संयुक्त रूप से प्रत्येक निर्माण का सर्वे करें, पुराने रिकॉर्ड से तुलना करें और पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ाएं, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच से ग्रामीणों और अधिकारियों दोनों पर लगे संदेह दूर होंगे। यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो समय रहते संभावित आर्थिक नुकसान और फर्जी दावों को रोका जा सकेगा।
इसलिए अब असली सवाल यही है— क्या खेतों में खड़े हो रहे इन छोटे-छोटे मकानों का सच सरकारी फाइलों से बाहर निकालकर जमीन पर जांचा जाएगा? क्या WCL प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र का वर्तमान ‘ग्राउंड रिकॉर्ड’ तैयार करेगा? क्या राजस्व प्रशासन हर निर्माण की तारीख और भूमि की कानूनी स्थिति सत्यापित करेगा? क्या सक्षम प्राधिकारी मुआवजा दावों से पहले वास्तविक हितधारकों की पहचान सुनिश्चित करेगा? और सबसे बड़ा सवाल— अगर नए निर्माण वास्तव में अधिग्रहण के संभावित मुआवजे को प्रभावित करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि 295 हेक्टेयर का यह भूमि अधिग्रहण केवल एक कानूनी प्रक्रिया बनकर रह जाता है या पारदर्शिता और जवाबदेही की वास्तविक कसौटी भी बनता है।




