ड्राइवर, हेल्पर और सफाई कामगारों के भुगतान में बढ़ोतरी की चर्चा; देर रात तक कार्यालय खुलने को लेकर भी उठे सवाल
घुग्घूस, चंद्रपुर : घुग्घूस नगर परिषद में ठेका पद्धति पर कार्यरत ड्राइवर, हेल्पर और सफाई कामगारों के वेतन को लेकर इन दिनों चर्चाओं का बाजार गर्म है। जानकारी के अनुसार, प्रत्येक कामगार के लिए करीब ₹15 हजार मासिक भुगतान निर्धारित होने की चर्चा है, जिसमें विभिन्न कटौतियों के बाद कामगार के हाथ में लगभग ₹13 हजार पहुंचने की बात कही जा रही है। अब नए टेंडर के बाद यह राशि बढ़कर करीब ₹18 हजार होने की चर्चा है।
हालांकि, वास्तविक सवाल यह है कि नए ठेकेदार के आने के बाद क्या कामगारों को वास्तव में बढ़ा हुआ भुगतान मिलेगा? क्या टेंडर में निर्धारित पूरी राशि कामगारों के बैंक खाते तक पहुंचेगी? या फिर पहले की तरह वेतन, कटौती और भुगतान को लेकर कामगारों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा?
महाराष्ट्र के नगरपरिषद प्रशासन से संबंधित आधिकारिक नियमों और निर्देशों में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, वेतन निर्धारण तथा ठेका प्रक्रिया को लेकर प्रावधान मौजूद हैं। नगर प्रशासन निदेशालय की ओर से नगरपरिषदों में सेवा संबंधी मामलों और वेतन निर्धारण की प्रक्रिया को लेकर हाल में भी निर्देश जारी किए गए हैं। साथ ही, ठेका और निविदा प्रक्रिया के लिए भी विभागीय स्थायी निर्देश उपलब्ध हैं।

ठेकेदार बदला तो क्या कामगारों की किस्मत भी बदलेगी?
ठेका बदलना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला वर्ग वही कामगार होता है जो प्रतिदिन सड़क, कचरा उठाने, वाहन संचालन और नगर की साफ-सफाई जैसे बुनियादी काम करता है।
ऐसे में नगर परिषद प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नए टेंडर में प्रति कामगार निर्धारित मजदूरी कितनी है, वैधानिक कटौतियां कितनी हैं, ठेकेदार को नगर परिषद से कितना भुगतान किया जाता है और कामगार के खाते में वास्तविक रूप से कितनी राशि जमा की जाएगी।
यदि टेंडर में ₹18 हजार का भुगतान निर्धारित है तो इसकी पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होना और कामगारों को नियमों के अनुसार भुगतान सुनिश्चित करना जरूरी है। केवल कागजों पर बढ़ी हुई राशि और जमीन पर पुराना भुगतान—ऐसी स्थिति किसी भी हालत में कामगार हित में नहीं मानी जा सकती।
नगर परिषद कार्यालय देर रात तक खुलने पर भी सवाल
दूसरी ओर, घुग्घूस नगर परिषद कार्यालय के सामान्य कामकाज का समय समाप्त होने के बाद भी देर रात तक कार्यालय में गतिविधियां दिखाई देने की चर्चा है। विशेष बैठकों और अन्य गतिविधियों के चलते कार्यालय देर रात तक खुला रहने को लेकर नागरिकों के बीच सवाल उठ रहे हैं।
महाराष्ट्र नगरपरिषद अधिनियम, 1965 में नगर परिषद और उसकी समितियों की बैठकों तथा उनके संचालन के लिए अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं। कानून में बैठकों के लिए नोटिस, कार्यसूची, अध्यक्षता और अन्य प्रक्रियाओं का उल्लेख है। यानी यदि देर रात कोई आधिकारिक बैठक या प्रशासनिक कामकाज होता है तो उसकी वैधानिक प्रक्रिया, अनुमति, बैठक की सूचना और रिकॉर्ड होना महत्वपूर्ण है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि कार्यालय शाम के बाद कभी खुल सकता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि देर रात तक चलने वाली गतिविधियां किस आधिकारिक आदेश, बैठक या प्रशासनिक आवश्यकता के तहत हो रही हैं? इसकी जानकारी नागरिकों के सामने क्यों नहीं रखी जाती?
आम नागरिकों के लिए नियम और कार्यालय के अंदर अलग व्यवस्था?
नागरिकों के लिए नगर परिषद का निर्धारित कार्यालय समय महत्वपूर्ण है। वहीं कर्मचारियों अथवा अधिकारियों से अतिरिक्त समय काम लिया जाता है तो संबंधित सेवा नियम, कार्यालय आदेश और लागू श्रम प्रावधानों का पालन होना चाहिए।
महाराष्ट्र के रोजगार एवं सेवा शर्तों से जुड़े मौजूदा कानून में वयस्क कामगार से सामान्यतः एक दिन में 9 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम लेने पर प्रतिबंध का प्रावधान है तथा लगातार पांच घंटे से अधिक काम के बीच विश्राम का प्रावधान है। अत्यावश्यक प्रकृति के काम में निर्धारित प्रक्रिया के तहत छूट का प्रावधान भी है।
इसलिए यदि ठेका कामगारों से नियमित रूप से निर्धारित समय से अधिक काम लिया जा रहा है, तो ओवरटाइम, कार्य समय, उपस्थिति और भुगतान का रिकॉर्ड जांच का विषय बन सकता है।
विपक्ष की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
नगर परिषद में सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। कामगारों के वेतन, टेंडर प्रक्रिया, नगर निधि से होने वाले भुगतान, कार्यालयीन कामकाज और नागरिकों से जुड़े प्रशासनिक मुद्दों पर विपक्ष को सवाल उठाने चाहिए।
यदि कामगारों के वेतन में कथित कटौती या टेंडर की राशि को लेकर शिकायतें हैं, तो विपक्षी पार्षदों को संबंधित दस्तावेज मांगकर स्थिति स्पष्ट करने की पहल करनी चाहिए। इसी तरह देर रात तक कार्यालय में होने वाली गतिविधियों पर भी बैठक की कार्यवाही, उपस्थिति रजिस्टर, आदेश और खर्च का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की जा सकती है।
दस्तावेज सामने आए तो साफ होगी पूरी तस्वीर
फिलहाल ₹15 हजार से बढ़कर ₹18 हजार भुगतान होने की चर्चा और कटौती के बाद ₹13 हजार मिलने की बात की आधिकारिक पुष्टि संबंधित टेंडर दस्तावेज और भुगतान रिकॉर्ड से ही हो सकती है।
इसलिए घुग्घूस नगर परिषद प्रशासन से यह स्पष्ट करने की मांग उठ रही है कि—
- नए टेंडर में प्रति कामगार वास्तविक मासिक राशि कितनी निर्धारित है?
- कामगार के खाते में कितनी राशि जमा की जाएगी?
- कौन-कौन सी वैधानिक कटौतियां होंगी?
- पुराने और नए टेंडर में मजदूरी की दर में कितना अंतर है?
- ठेकेदार को नगर परिषद द्वारा कुल कितना भुगतान किया जाता है?
- कामगारों की उपस्थिति और वेतन का सत्यापन कौन करता है?
- देर रात तक चलने वाली बैठकों अथवा कार्यालयीन गतिविधियों के लिए क्या आधिकारिक आदेश और रिकॉर्ड मौजूद है?
- यदि अतिरिक्त समय काम कराया जाता है तो उसके भुगतान और कार्य-समय का रिकॉर्ड कैसे रखा जाता है?
नगर प्रशासन निदेशालय महाराष्ट्र नगर परिषदों के लिए अधिनियम, नियम, सेवा नियम और निविदा संबंधी स्थायी निर्देश प्रकाशित करता है। इसलिए घुग्घूस नगर परिषद में भी टेंडर की शर्तें, भुगतान रिकॉर्ड और कार्यालयीन प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से सामने आने पर ही तमाम चर्चाओं और सवालों का जवाब मिल सकेगा।
अब निगाह इस बात पर है कि ठेकेदार बदलेगा तो क्या केवल ठेका बदलेगा, या वास्तव में कामगारों के वेतन और अधिकारों की स्थिति भी बदलेगी? साथ ही यह भी देखना होगा कि नगर परिषद प्रशासन, जनप्रतिनिधि और विपक्ष इस पूरे मामले में कितनी गंभीरता से जवाबदेही तय करते हैं।




