प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले आकर्षक वादों और घोषणाओं का उद्देश्य जनता का विश्वास जीतना होता है। चुनाव 2025 के दौरान जारी किए गए एक जाहिरनामे में कुल 37 महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया गया था। इन्हीं में क्रमांक 15 पर यह वादा किया गया था कि “बस स्टैंड परिसर का सौंदर्यीकरण किया जाएगा तथा छत्रपति शिवाजी महाराज की अश्वारूढ़ प्रतिमा स्थापित की जाएगी।”
लेकिन चुनाव बीतने और सत्ता गठन के बाद अब इस वादे की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। जिस बस स्टैंड परिसर को शुरू हुए दो-तीन वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, उसकी हालत देखकर यह कहना मुश्किल है कि यहां किसी व्यापक सौंदर्यीकरण की दिशा में गंभीर प्रयास हुए हैं। कागजों में विकास योजनाएं और प्रस्ताव जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की अश्वारूढ़ प्रतिमा की मांग कोई नई नहीं है। इस मुद्दे को लेकर पूर्व में अनेक आंदोलन, बैठकों और जनप्रतिनिधियों के साथ चर्चाएं हो चुकी हैं। कुछ लोगों ने तो इसी मुद्दे को चुनावी हथियार बनाकर राजनीतिक लाभ भी लिया। चुनावी मंचों से बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन आज यह विषय ठंडे बस्ते में जाता दिखाई दे रहा है।
वादा या राजनीतिक जुमला?
राजनीति में घोषणाएं करना आसान होता है, लेकिन उन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा करना ही जनप्रतिनिधियों की असली परीक्षा होती है। घुग्घुस में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि बस स्टैंड सौंदर्यीकरण और प्रतिमा स्थापना का मुद्दा कहीं केवल चुनावी जुमला बनकर तो नहीं रह गया? नागरिक यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस परियोजना की वर्तमान स्थिति क्या है, कितनी राशि स्वीकृत हुई, किस विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई और काम शुरू न होने के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं?
नगर परिषद और टाउन प्लानिंग पर उठ रहे सवाल
घुग्घुस नगर परिषद प्रशासन की टाउन प्लानिंग, डेवलपमेंट विजन और परियोजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विकास कार्यों के लिए नियोजन, तकनीकी मंजूरी, निधि उपलब्धता, सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) के नियम, भू-उपयोग अनुमति, प्रतिमा स्थापना संबंधी प्रशासनिक प्रक्रियाएं और सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक होता है। यदि इन प्रक्रियाओं में देरी हो रही है, तो उसकी जानकारी जनता के सामने रखना भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए केवल घोषणा पर्याप्त नहीं होती। उसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), बजट प्रावधान, तकनीकी स्वीकृति, निविदा प्रक्रिया और समयबद्ध कार्ययोजना आवश्यक होती है। यदि इन चरणों में प्रगति नहीं हुई है तो विकास के दावों पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
जनता जवाब चाहती है
स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनाव के समय किए गए वादों का मूल्यांकन केवल भाषणों से नहीं बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले कार्यों से होना चाहिए। यदि बस स्टैंड परिसर का सौंदर्यीकरण और छत्रपति शिवाजी महाराज की अश्वारूढ़ प्रतिमा स्थापना वास्तव में प्राथमिकता में है, तो उसकी प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।
आज स्थिति यह है कि नागरिक यह जानना चाहते हैं कि वादे पूरे करने की दिशा में वास्तविक काम हो रहा है या फिर फंड की कमी, प्रशासनिक देरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह योजना “ऑक्सीजन” पर चल रही है।
दूसरे वर्ष की परीक्षा
जाहिरनामे का 15वां मुद्दा अपने पहले वर्ष में कितना सफलता पर है, इसका आकलन अब जनता स्वयं कर रही है। आने वाला दूसरा वर्ष इस वादे की असली परीक्षा साबित होगा। यदि कार्य शुरू होता है तो यह सत्ता पक्ष की उपलब्धि मानी जाएगी, लेकिन यदि स्थिति जस की तस रही तो विपक्ष को सवाल उठाने का अवसर मिलेगा।
फिलहाल घुग्घुस की जनता की नजर नगर परिषद प्रशासन और सत्ता पक्ष दोनों पर टिकी हुई है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि जनता की शंकाएं सही थीं या राजनीति के दावे। आखिरकार लोकतंत्र में चुनावी वादों का असली मूल्यांकन पांच वर्षों के कार्यकाल में किए गए कार्यों से ही होता है, न कि चुनावी मंचों पर किए गए आकर्षक घोषणाओं से।
पार्ट.15…




