वादों की सड़क या जुमलों की राजनीति?
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा आकर्षक “जाहिरनामा” जारी कर जनता से बड़े-बड़े विकास के वादे किए जाते हैं। वर्ष 2025 के नगर परिषद चुनाव में भी सत्ता पक्ष द्वारा 37 मुद्दों वाला एक आकर्षक जाहिरनामा प्रकाशित किया गया था। उसी में एक प्रमुख मुद्दा था — “संपूर्ण शहरात सीमेंट कांक्रीट रस्त्याचे बांधकाम केल्या जाईल.” चुनाव के दौरान इस वादे को शहर के विकास का बड़ा सपना बताकर जनता के सामने प्रस्तुत किया गया था। लेकिन अब सत्ता के पहले वर्ष नागरिकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर नए सीमेंट रोड के कितने काम वास्तव में शुरू हुए?
जानकारों के अनुसार नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में जिन सड़कों का भूमिपूजन दिखाया जा रहा है, उनमें से अधिकांश कामों की प्रक्रिया चुनाव से पहले ही शुरू हो चुकी थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सत्ता में आने के बाद नई सड़कों के लिए कितने प्रस्ताव मंजूर हुए, कितने टेंडर निकले और कितने कामों का वास्तविक भूमिपूजन किया गया?
शहर के कई हिस्सों में सड़कें बनी जरूर हैं, लेकिन गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई स्थानों पर सड़क किनारे मुरूम नहीं डाला गया, जिससे ऊंची-नीची सतह के कारण दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। नागरिकों का कहना है कि सड़क निर्माण के बाद उचित साइड फिलिंग, जल निकासी और सुरक्षा मानकों का पालन करना भी नगर परिषद की जिम्मेदारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर लापरवाही दिखाई दे रही है।
महिलाओं, वाहन चालकों और स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अधूरे विकास कार्यों के कारण रोजमर्रा की परेशानियां बढ़ गई हैं। कहीं पार्किंग की समस्या है, कहीं सफाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है, तो कहीं खराब सड़क किनारे दुर्घटना का डर बना हुआ है। लोगों का कहना है कि “भूमिपूजन की राजनीति” ज्यादा दिखाई दे रही है, जबकि वास्तविक और टिकाऊ विकास कम नजर आ रहा है।
नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। नागरिकों में चर्चा है कि मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, बांधकाम सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर की जिम्मेदारी केवल एसी केबिन में बैठकर फाइलों पर “कार्य संतोषजनक” लिखने तक सीमित नहीं हो सकती। महाराष्ट्र नगर परिषद अधिनियम और सार्वजनिक निर्माण से जुड़े नियमों के अनुसार गुणवत्ता नियंत्रण, साइट निरीक्षण, तकनीकी प्रमाणन और नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासनिक अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों की संयुक्त जिम्मेदारी मानी जाती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी निर्माण कार्य में गुणवत्ता की कमी, तकनीकी लापरवाही या सार्वजनिक सुरक्षा की अनदेखी साबित होती है, तो संबंधित विभागीय अधिकारियों, ठेकेदारों और जिम्मेदार पदाधिकारियों पर जवाबदेही तय की जा सकती है। इसके बावजूद आम जनता को अक्सर शिकायतों के बाद भी केवल आश्वासन ही मिलता है।
अब शहर में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या विकास कार्य फंड की कमी से प्रभावित हैं? क्या सरकार और स्थानीय प्रशासन आर्थिक दबाव में काम कर रहे हैं? या फिर चुनावी वादे केवल राजनीतिक जुमले साबित हो रहे हैं?
जनता का कहना है कि पहला साल “परीक्षा” का साल माना जाता है। इसी दौरान यह तय होता है कि सत्ता पक्ष केवल घोषणाओं तक सीमित रहेगा या वास्तव में जमीनी विकास करेगा। आने वाले दूसरे वर्ष में यह और स्पष्ट होगा कि जाहिरनामे के वादे फाइलों में सीमित रहे या सड़कों पर दिखाई दिए।
फिलहाल शहर की जनता सब देख रही है — वादे भी, भूमिपूजन भी, और जमीनी हकीकत भी।
अब आने वाले पांच वर्ष तय करेंगे कि जनता का विश्वास मजबूत होगा या “जुमलेबाजी” की राजनीति पर सवाल और गहरे होंगे।
पार्ट.5…




