(प्रणयकुमार बंडी)
यवतमाल/वणी: बेलोरा घाट इन दिनों अवैध रेत उत्खनन का बड़ा केंद्र बन चुका है। खुलेआम दिन और रात के समय पोकलेन (पीसी) मशीनों और हाइवा ट्रकों की मदद से रेत निकाली जा रही है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ प्रशासन की आंखों के सामने हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा हुआ है।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, इस अवैध कारोबार में प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता की चर्चा है। कथित तौर पर आजी-माजी जनप्रतिनिधि, रिकॉर्ड पर दर्ज तस्कर, ठेकेदार और कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता भी इस खेल में शामिल बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि पुलिस और राजस्व विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
बताया जा रहा है कि यहां से निकाली जा रही रेत सिर्फ यवतमाल जिला तक सीमित नहीं है, बल्कि चंद्रपुर जिला, वर्धा जिला और नागपुर जिला सहित आसपास के कई इलाकों और अन्य राज्यों तक पहुंचाई जा रही है। इससे सरकार के खजाने को लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है, जबकि पर्यावरण पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, भूजल स्तर प्रभावित हो रहा है और भविष्य में बाढ़ जैसे खतरे बढ़ सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रेत से भरे हाइवा ट्रक सड़कों पर दौड़ रहे हैं, तब स्थानीय पुलिस और राजस्व विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लग रही? क्या यह महज़ लापरवाही है या फिर किसी बड़े संरक्षण का परिणाम?
अब निगाहें घुग्घुस पुलिस और सिरपुर पुलिस पर टिकी हैं। क्या ये विभाग रेत माफिया पर सख्त कार्रवाई कर कानून का राज स्थापित करेंगे, या फिर यह अवैध कारोबार यूं ही फलता-फूलता रहेगा?
इसी के साथ राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी कटघरे में है। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह न सिर्फ प्रशासन की साख पर सवाल होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरणीय संकट भी खड़ा करेगा।
अब देखना दिलचस्प होगा कि शासन-प्रशासन इस चुनौती को गंभीरता से लेता है या बेलोरा घाट पर रेत माफिया का साम्राज्य यूं ही चलता रहेगा।




