(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र के घुग्घुस-वणी मार्ग पर बने आधे-अधूरे नए रेलवे उड़ान पुल के नीचे हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। यहां जाम, अव्यवस्था और भारी वाहनों की मनमानी ने आम नागरिकों की जान जोखिम में डाल दी है, लेकिन शासन-प्रशासन अब भी गहरी नींद में नजर आ रहा है।
रोजाना इस मार्ग से सैकड़ों छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। भारी भरकम ट्रकों पर न तो कोई नियंत्रण है और न ही यातायात की कोई ठोस व्यवस्था। चालक मनमाने ढंग से पार्किंग करते हैं, दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते और नियमों को खुली चुनौती देते दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप यह मार्ग दुर्घटनाओं का गढ़ बनता जा रहा है।
आज फिर लापरवाही की एक भयावह तस्वीर सामने आई, जब एक ट्रक के पहिए के नीचे मोटरसाइकिल आ गई। मोटरसाइकिल सवार युवक बाल-बाल बच गया, लेकिन उसकी बाइक पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। सवाल यह है कि अगर आज युवक की जान चली जाती तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या प्रशासन केवल किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही जागेगा?
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, दिसंबर माह में इस पुल पर एक तरफा आवागमन शुरू करने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन यह वादा भी कागजों और बैठकों तक ही सीमित रह गया। जमीनी हकीकत यह है कि न तो निर्माण कार्य पूरी तरह पूरा हुआ है और न ही अस्थायी यातायात व्यवस्था लागू की गई है।
विडंबना यह है कि इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन करने वाले कुछ लोगों ने नगर सेवक और सभापति जैसे पद हासिल किए। आज वही जनप्रतिनिधि खामोश क्यों हैं? क्या कुर्सी मिलते ही जनता की समस्याएं मौन हो जाती हैं? क्षेत्र में अब जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
घुग्घुस-वणी मार्ग की वर्तमान स्थिति किसी भी बड़े हादसे को न्योता दे रही है। जाम में फंसे एम्बुलेंस, स्कूल वाहन और आम नागरिक रोजाना खतरे का सामना कर रहे हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो कोई बड़ा हादसा होने में देर नहीं लगेगी।
अब देखना यह है कि शासन प्रशासन और संबंधित विभाग कब जागेंगे? क्या आम नागरिकों की जान की कीमत किसी फाइल या राजनीतिक सुविधा से कम है? या फिर घुग्घुस की जनता को यूं ही अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने के लिए मजबूर रहना पड़ेगा?




