चंद्रपुर/घुग्घुस: घुग्घुस के मार्केट लाईन स्थित 100 वर्ष से अधिक पुराने ऐतिहासिक तालाब को अवैध रूप से मिट्टी भरकर खत्म किए जाने का मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही की अग्निपरीक्षा बन गया है। स्थानीय नागरिकों की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची, जहां से तत्काल संज्ञान लेते हुए Devendra Fadnavis के कार्यालय से कलेक्टर चंद्रपुर और अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) को ई-मेल प्रेषित किया गया। प्रतिलिपि सामाजिक कार्यकर्ता प्रणयकुमार बंडी के नाम भी भेजी गई।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या सिर्फ पत्राचार से तालाब बचेगा? किसके इशारे पर हुआ भराव?
सूत्रों के अनुसार, सैकड़ों स्क्वायर फीट क्षेत्र में मिट्टी डाली जा चुकी है। अब जांच का असली मुद्दा यह है—तालाब में मिट्टी डालने के लिए किन वाहनों का उपयोग हुआ? उन वाहनों के नंबर क्या हैं? मिट्टी कहां से लाई गई? किसने इसकी अनुमति दी? क्या नगर परिषद, तहसील या किसी अन्य विभाग ने मौन सहमति दी? यदि यह कार्य बिना अनुमति हुआ है, तो यह सीधे तौर पर पर्यावरणीय अपराध की श्रेणी में आता है।
क्या पुलिस में दर्ज होगी FIR?
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस प्रकरण में FIR दर्ज की जा सकती है, क्योंकि—पर्यावरण संरक्षण कानूनों का उल्लंघन, जलस्रोत को नुकसान, सार्वजनिक हित प्रभावित होना, ये सभी दंडनीय अपराध हैं।
यदि शिकायतकर्ता पुलिस थाने में लिखित शिकायत देते हैं, तो पुलिस को प्रारंभिक जांच कर प्रकरण दर्ज करना होगा। सवाल यह है कि क्या पुलिस स्वतः संज्ञान लेगी या फिर शिकायतकर्ता को दर-दर भटकना पड़ेगा?
CCTV फुटेज: सच सामने आएगा या मिटा दिया जाएगा?
मार्केट लाईन जैसा व्यस्त क्षेत्र CCTV से अछूता नहीं है। क्या नगर परिषद, आसपास की दुकानों या निजी प्रतिष्ठानों के कैमरों में मिट्टी डालने वाले वाहन कैद हुए हैं? क्या फुटेज सुरक्षित है या “तकनीकी कारणों” से डिलीट हो चुका होगा?
अक्सर ऐसे मामलों में सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि प्रशासन गंभीर है, तो उसे तुरंत CCTV फुटेज जब्त कर फोरेंसिक जांच करानी चाहिए।
प्रशासन की भूमिका पर प्रश्नचिह्न
नागरिकों ने पहले भी नगर परिषद को तालाब संरक्षण के लिए अवगत कराया था। बावजूद इसके, मुख्याधिकारी और संबंधित विभागीय अधिकारियों की निष्क्रियता ने तालाब मालिक को खुली छूट दे दी। क्या यह महज लापरवाही है या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने की कोशिश?
पर्यावरण बनाम निजी स्वार्थ
तालाब केवल पानी का गड्ढा नहीं होता—यह भू-जल रिचार्ज का स्रोत है, धार्मिक आस्था (गणेश व देवी विसर्जन) का केंद्र है, पशुधन और स्थानीय जीव-जंतुओं का जीवन आधार है, सिंघाड़ा उत्पादन जैसे स्थानीय रोजगार का साधन है। ऐसे जलस्रोत को खत्म करना सीधे-सीधे आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों पर कुठाराघात है।
अब आगे क्या?
मुख्यमंत्री कार्यालय से पत्र जाने के बाद निगाहें कलेक्टर और स्थानीय प्रशासन पर टिकी हैं। क्या अवैध भराव तुरंत रोका जाएगा? क्या दोषियों पर आपराधिक मामला दर्ज होगा? क्या तालाब को “संरक्षित जलस्रोत” घोषित कर वैज्ञानिक पुनर्जीवन योजना बनेगी? या फिर… कुछ दिन मीडिया में चर्चा होगी, फाइलें विभागों में घूमेंगी, और मामला हमेशा की तरह धूल फांकता रह जाएगा?
घुग्घुस का यह तालाब अब सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी की परीक्षा बन चुका है। जनता देख रही है—क्या कानून सच में सबके लिए बराबर है, या फिर ताकतवर लोगों के लिए अलग नियम हैं?




