(प्रणयकुमार बंडी)
चुनाव की आहट मिलते ही गली-मोहल्लों में फिर वही पुराना नज़ारा लौट आया है। नुक्कड़ की चाय की दुकानों पर अचानक भीड़ बढ़ गई है, व्हाट्सऐप स्टेटस पर नए-नए “भावी नगरसेवक” उग आए हैं, और हर गली का “भाई” अब जनता की सेवा के नाम पर अपनी दुकान सजाने निकल पड़ा है।
कहने को तो ये सब “जनता के सेवक” हैं, लेकिन असल में ये चुनाव को “कमाई का सीजन” मान चुके हैं। जैसे ही चुनावी बिगुल बजा नहीं, इन्होंने भावी उम्मीदवारों को बहलाने-फुसलाने की मुहिम शुरू कर दी। किसी को टिकट चाहिए तो कोई टिकट दिलाने वाला बन बैठा है। और मजे की बात ये कि कुछ तो ऐसे भी हैं जो हर पार्टी के दफ्तर में जाकर “अपनी जगह पक्की” कर रहे हैं — “अगर उधर से नहीं मिला तो इधर से सही!”
अब देखिए, कुछ लोग अपने बेटे-बेटियों और धर्मपत्नी को “नेता बनाने की मुहिम” में जुट गए हैं। जैसे राजनीति कोई पारिवारिक बिजनेस हो — “बेटा पढ़ाई में कमजोर है, चलो उसे टिकट दिलवा देते हैं, कम से कम नगरसेवक तो बनेगा!” और धर्मपत्नी को टिकट दिलाने वाले जनाब का तो कहना है, “घर में भी सेवा करती है, अब जनता की भी कर ले।”
पर असली मज़ा तो उन नेताओं का है जो वार्ड की जनसंख्या तक नहीं जानते, पर दावा करते हैं कि वे “जनता की नब्ज़” समझते हैं। इन्हें यह तक नहीं मालूम कि उनके वार्ड में कितने प्रभाग हैं, कौन कहां रहता है, कौन क्या करता है — लेकिन इनका पोस्टर जरूर हर दीवार पर टंगा है — “आपका सेवक, आपके बीच, आपके लिए!”
कुछ जगह तो ये चर्चा है कि “फॉर्म भरो और फिर फॉर्म पीछे लो — पैसा मिलेगा!” अब भला बताइए, जब उम्मीदवारी तक बिकने लगी हो, तो जनता की उम्मीदें कितनी सस्ती होंगी?
दुख की बात यह है कि ऐसे मौकापरस्त चेहरों के बीच सच्चे और ईमानदार लोग दब जाते हैं। जो वास्तव में समाज के लिए काम करते हैं, वे जाति, धर्म और गुटबाजी की भूलभुलैया में फंस जाते हैं। और जनता? जनता भी अब इस नाटक की आदी हो गई है — “हर पांच साल में वही चेहरा, बस पार्टी का झंडा बदल जाता है!”
अब सवाल ये है:
क्या जनहित के लिए सच में समर्पित व्यक्ति इन “ढोंगी नेताओं” के बीच टिक पाएगा?
या फिर जनता की आवाज़ फिर से उन खोखले नारों और झूठे वादों के शोर में दब जाएगी?
क्योंकि, आज राजनीति नहीं, राजनीतिक नौटंकी चल रही है —
जहां जनसेवा का नाम लेकर टिकट सेवा,
और जनता के नाम पर सिर्फ अपना स्वार्थ परोसा जा रहा है।
अब फैसला जनता को करना है —
क्या वो फिर से उन्हीं चेहरों पर भरोसा करेगी,
या इस बार “सेवा” और “सौदेबाज़ी” में फर्क पहचान लेगी?




