आज के दौर में मीडिया हर व्यक्ति की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित करने का सबसे ताकतवर माध्यम बन चुका है। अख़बार, न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म न सिर्फ़ सूचनाएं देते हैं, बल्कि जनमत बनाने का काम भी करते हैं। लेकिन यह बात अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है कि इन माध्यमों को चलाने के लिए संसाधन, श्रम और खर्च की भी आवश्यकता होती है। ऐसे में कुछ नेताओं द्वारा अपने प्रचार को मुफ्त में निरंतर मीडिया में बनाए रखना अब अनुचित और असंभव होता जा रहा है।
अब समय आ गया है कि नेताओं को यह समझना होगा कि अगर वे बार-बार मीडिया में बने रहना चाहते हैं, तो उन्हें उसकी उचित कीमत चुकानी होगी।
मीडिया संस्थानों को चलाने के लिए संपादक, रिपोर्टर, प्रिंटर, टेक्नीशियन, डिजाइनर, सोशल मीडिया ऑपरेटर, और इंटरनेट जैसी कई सेवाओं के लिए शुल्क देना पड़ता है। ये सभी व्यवस्था तब तक सुचारु नहीं रह सकती जब तक इनका आर्थिक आधार मजबूत न हो। और इसका सबसे प्रमुख स्रोत है – विज्ञापन (Advertising)।
कई बार देखा गया है कि कुछ नेता हमेशा ‘मुफ्त में प्रसिद्धि’ की तलाश में रहते हैं। हर छोटी-बड़ी गतिविधि को समाचारों में शामिल करवाना उनका स्वभाव बन चुका है, चाहे वह जनहित से जुड़ी हो या केवल व्यक्तिगत प्रचार की मंशा से की गई हो। इससे न केवल मीडिया की साख प्रभावित होती है, बल्कि वास्तविक सामाजिक मुद्दे और जनसरोकार की खबरें पीछे छूट जाती हैं।
मीडिया की प्राथमिकता बदलनी होगी
अब मीडिया संस्थानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी को चर्चा में रहना है, तो उसे विज्ञापन के रूप में अपना सहयोग देना होगा।
फालतू प्रचार वाली मुफ्त खबरों की जगह अब समाज में व्याप्त समस्याओं, सरकारी योजनाओं की असफलताओं, भ्रष्टाचार, जनसेवा, और जनहित की आवाज़ को प्राथमिकता दी जाएगी।
हमारे पास ऐसे विषयों की कोई कमी नहीं है जो जनता से सीधे जुड़े हैं — बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां, ग्रामीण क्षेत्रों की दुर्दशा, और सरकार की नीतियों का असल प्रभाव। यदि नेता वाकई जनप्रतिनिधि हैं, तो उन्हें अपने कार्यों से और पारदर्शिता से मीडिया में आना चाहिए, न कि महज़ चर्चा में रहने की लालसा से।
मीडिया एक सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाला माध्यम है, न कि मुफ्त प्रचार का जरिया।
समय की मांग है कि नेता और जनप्रतिनिधि इस बदलाव को समझें और यदि वे प्रचार चाहते हैं, तो उसका उचित शुल्क देकर ही करें।
वरना अब मीडिया उन खबरों को प्राथमिकता देगा जो समाज को जागरूक करें, व्यवस्था पर सवाल उठाएं और जनता की असल समस्याओं को उजागर करें।
“अब चर्चा में रहने के लिए कीमत चुकानी होगी – क्योंकि मीडिया भी बिना संसाधन के नहीं चलता।”





