Wednesday, April 29, 2026

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इतिहास के पन्नों में आज: स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी का आगमन (17 जून, 1885)

आज का दिन विश्व इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। 17 जून, 1885 को अमेरिका के न्यूयॉर्क बंदरगाह पर एक ऐसी मूर्ति पहुंची, जो आज केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, लोकतंत्र और आशा का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है — स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी।

फ्रांस की ओर से दोस्ती का उपहार

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी, जिसे आधिकारिक रूप से “लिबर्टी इनलाइटनिंग द वर्ल्ड” कहा जाता है, फ्रांस की जनता द्वारा अमेरिका को एक उपहार स्वरूप दी गई थी। यह मूर्ति अमेरिका की स्वतंत्रता की सौवीं वर्षगांठ (1776-1876) के अवसर पर मित्रता के प्रतीक के रूप में भेंट की गई थी। हालांकि इसका निर्माण कार्य 1884 में पूरा हो गया था, लेकिन इसे समुद्र के रास्ते न्यूयॉर्क लाने में एक साल का समय लग गया।

समुद्री यात्रा और आगमन

1885 में, स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी को 350 से अधिक हिस्सों में तोड़कर लकड़ी के 214 बक्सों में पैक किया गया और फ्रांसीसी जहाज ‘Isère’ से न्यूयॉर्क लाया गया। यह जहाज 17 जून को न्यूयॉर्क बंदरगाह पर पहुंचा। वहां इसका भव्य स्वागत हुआ। न्यूयॉर्क के लोगों ने इसे बड़ी उम्मीदों और गर्व के साथ देखा, क्योंकि यह केवल एक मूर्ति नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता की भावना का मूर्त रूप थी।

निर्माण और स्थापना

इस प्रतिमा की डिजाइन फ्रांसीसी मूर्तिकार फ्रेडरिक ऑगस्ट बार्थोल्डी ने की थी, जबकि इसका धातु का ढांचा प्रसिद्ध इंजीनियर अलेक्जेंडर गुस्टाव एफिल (एफिल टॉवर के निर्माता) ने बनाया था। इसे अमेरिका के लिबर्टी द्वीप (तब बेडलो आइलैंड) पर स्थापित किया गया, और इसका उद्घाटन 28 अक्टूबर, 1886 को किया गया।

प्रतीकात्मक महत्व

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी एक महिला की मूर्ति है जो दाहिने हाथ में मशाल और बाएं हाथ में एक पुस्तक पकड़े हुए है, जिस पर अमेरिकी स्वतंत्रता की तिथि 4 जुलाई, 1776 अंकित है। उसके पैरों के नीचे टूटी हुई जंजीरें पड़ी हैं, जो अत्याचार और गुलामी से मुक्ति का संकेत देती हैं।

17 जून का दिन हमें याद दिलाता है उस ऐतिहासिक क्षण का, जब एक महान विचार, “स्वतंत्रता और समानता”, आकार लेकर अमेरिका की धरती पर पहुंचा। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी आज भी दुनिया भर से आने वाले लोगों के लिए एक स्वागत चिन्ह है — एक ऐसा प्रतीक जो बताता है कि दुनिया में आशा, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए हमेशा स्थान है।

“स्वतंत्रता का यह दीपक अनंतकाल तक जलता रहे…”

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Pranaykumar Bandi

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