भारतीय संगीत की विविधता और गहराई में कुछ स्वर ऐसे भी हैं, जो समय और समाज की परिधि से बाहर रह गए। पंजाब की मिरासी महिलाओं की संगीत परंपरा भी एक ऐसी ही धरोहर है, जिसे आज भी व्यापक पहचान की आवश्यकता है। सदियों से मिरासी समुदाय लोकसंगीत, कव्वाली, सूफी गायन और शास्त्रीय संगीत की अनेक विधाओं का संवाहक रहा है, परंतु मिरासी महिलाओं की भूमिका अक्सर अनदेखी रह गई।
इन महिलाओं की आवाज़ें किसी महफिल की शोभा भले न बनी हों, लेकिन इन्होंने घरों में, खेतों में, मेलों में, और सूफी दरगाहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इनके गीतों में पीड़ा, प्रेम, विरह, और अध्यात्म की गूंज है — जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृति और अनुभव से आगे बढ़ती रही।
मिरासी महिलाएं न केवल गायन में पारंगत थीं, बल्कि इन्होंने तानपूरा, ढोलक, इकतारा जैसे वाद्ययंत्रों पर भी महारत हासिल की। समाज की दकियानूसी सोच और जातिगत भेदभाव ने भले ही इन्हें मंचों से दूर रखा, लेकिन इनके स्वर कभी मौन नहीं हुए। आज यह आवश्यक हो गया है कि इन्हें मुख्यधारा में स्थान दिया जाए, और इनकी संगीत यात्रा को स्वर और सम्मान मिले।
धरोहर: पं. रघुनंदन पणशीकर (जयपुर-अतरौली घराना) की भावपूर्ण प्रस्तुति
शास्त्रीय संगीत की परंपरा में जयपुर-अतरौली घराने की पहचान उसकी जटिल रचनाओं और सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति में है। इसी परंपरा के वरिष्ठ गायक, पंडित रघुनंदन पणशीकर की हालिया प्रस्तुति में संगीत की यह गहराई स्पष्ट रूप से झलकी।
उनकी गायकी में न केवल राग की शुद्धता थी, बल्कि उसमें एक आत्मिक भाव भी था जो श्रोता को भीतर तक स्पर्श करता है। विशेष रूप से राग मालकौंस में उनकी बंदिश “गुरु बिन ज्ञान कहां से होई” ने मंच पर एक आध्यात्मिक वातावरण बना दिया। उनके आलाप और बोल-आलाप की रचना में अनुभव की परिपक्वता और घराने की परंपरा की स्पष्ट छाप दिखी।
यह प्रस्तुति न केवल एक संगीत कार्यक्रम थी, बल्कि एक धरोहर के रूप में उस परंपरा की जीवंत झलक थी, जिसे पणशीकर जी ने वर्षों की साधना से सींचा है।
माटी सुगंध: जोधपुर के बाप गांव की झलक — ‘मेरा गांव, मेरी धरोहर’ पहल के तहत
राजस्थान के थार मरुस्थल में स्थित जोधपुर का बाप गांव एक सांस्कृतिक खजाना है, जिसे ‘मेरा गांव, मेरी धरोहर’ पहल के तहत फिर से खोजा और प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह गांव न केवल अपने स्थापत्य और परंपरागत घरों के लिए जाना जाता है, बल्कि यहाँ की लोककला, मिट्टी के खिलौने, हस्तशिल्प और लोकगीतों में समृद्ध सांस्कृतिक विरासत छिपी है। बाप गांव के बुजुर्गों की कथाएँ, पारंपरिक जलसंचयन प्रणाली (जैसे ‘तला’ और ‘बावड़ी’) और स्थानीय उत्सव आज भी गांव की जीवंतता को बनाए रखते हैं।
इस पहल का उद्देश्य है कि गांवों को केवल पिछड़े भूगोल के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें जीवंत सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में पहचान मिले। बाप गांव इस दृष्टिकोण का एक सशक्त उदाहरण है — जहां माटी से जुड़ी खुशबू में स्मृति, परंपरा और आशा समाहित है।
चाहे वह पंजाब की मिरासी महिलाओं की अनसुनी सुरयात्रा हो, जयपुर-अतरौली घराने का भावपूर्ण गायन, या बाप गांव की माटी की सोंधी महक — ये सभी हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर के अभिन्न स्वरूप हैं। इनका संरक्षण और प्रचार हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को समृद्ध करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।




