The purpose of education is not merely to impart bookish knowledge, but to connect future generations with ethics, responsibility, and social values. Teachers are considered the pillars who realize this purpose. However, when these very teachers turn education into a business for their personal gain, it not only raises serious questions about the education system but also shakes the very foundation of society. This is exactly the situation unfolding in Ghugghus and its surrounding areas, where the business of illegal tuition under the guise of teaching is flourishing openly.
अवैध ट्यूशन क्लासेस: घुग्घुस की शिक्षा व्यवस्था में पनपता भ्रष्टाचार
भूमिका:
शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को नैतिकता, जिम्मेदारी और सामाजिक मूल्यों से जोड़ना होता है। शिक्षक इस उद्देश्य को साकार करने वाले स्तंभ माने जाते हैं। लेकिन जब यही शिक्षक अपने निजी स्वार्थ के लिए शिक्षा को व्यापार बना लें, तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि पूरे समाज की बुनियाद को हिलाकर रख देता है। घुग्घुस और आसपास के इलाकों में यही स्थिति देखने को मिल रही है, जहां शिक्षक और शिक्षिका के नाम पर अवैध ट्यूशन का कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है।
शिक्षक या व्यापारी?:
सूत्रों के अनुसार, घुग्घुस क्षेत्र में कई गैर सरकारी (प्राइवेट) स्कूलों के शिक्षक न केवल स्कूल में पढ़ा रहे हैं, बल्कि निजी ट्यूशन क्लासेस भी चला रहे हैं। यह शिक्षकों के सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब इन शिक्षकों को स्कूल मैनेजमेंट और शिक्षा विभाग का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है। सवाल उठता है – क्यों इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती?
प्रशासन की चुप्पी – मौन स्वीकृति या मिलीभगत?:
शिक्षा अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन की ओर से इन अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज किया जाना यह दर्शाता है कि या तो वे इस भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा हैं या फिर अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं। कई बार राज्य सरकार और शिक्षा अधिकारियों का ध्यान इस ओर खींचा गया, परंतु परिणाम हमेशा शून्य रहा। यह व्यवहार केवल लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने जैसा है।
अभिभावकों की मजबूरी – डर के साए में शिक्षा:
आज अभिभावक अपने बच्चों को इन ट्यूशन क्लासेस में भेजने के लिए मजबूर हैं। उन्हें डर है कि यदि बच्चा ट्यूशन नहीं जाएगा, तो स्कूल में उसे फेल कर दिया जाएगा या आंतरिक मूल्यांकन में जानबूझकर कम अंक दिए जाएंगे। यह स्थिति बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर डाल रही है। स्कूल में पढ़ाया नहीं जाता और वही विषय ट्यूशन में पढ़ाया जाता है। क्या यह एक सुनियोजित उगाही तंत्र नहीं है?
शिक्षा में आर्थिक असमानता:
इन अवैध ट्यूशन क्लासेस का सबसे बुरा असर उन बच्चों पर पड़ता है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। वे न तो ट्यूशन का खर्च उठा सकते हैं, न ही स्कूल में पूरी तरह से पढ़ाई प्राप्त कर पा रहे हैं। इससे शिक्षा में भारी असमानता पैदा हो रही है, और गरीब वर्ग के छात्र पिछड़ते जा रहे हैं।
शिक्षकों की भूमिका पर सवाल:
कुछ शिक्षकों का व्यवहार केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडों से प्रेरित प्रतीत होता है। वे शिक्षक कम और ‘प्रवक्ता’ या ‘ब्रेनवॉशर’ अधिक नजर आते हैं। यह न केवल शिक्षा की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि विद्यार्थियों की सोच को भी प्रभावित करता है।
समस्या की जड़ और समाधान:
इस समस्या की जड़ में है – कमजोर निगरानी, प्रशासनिक उदासीनता और शिक्षक के रूप में अनुशासनहीनता। इससे निपटने के लिए निम्न कदम उठाना आवश्यक हैं:
शिकायत तंत्र मजबूत किया जाए, जहां अभिभावक और छात्र सुरक्षित तरीके से अवैध ट्यूशन की जानकारी दे सकें।
जांच समिति गठित की जाए, जो ऐसे शिक्षकों की पहचान कर रिपोर्ट तैयार करे।
ऐसे शिक्षकों की B.Ed/D.Ed की मान्यता रद्द की जाए, और उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाए।
स्कूल मैनेजमेंट पर भी कार्रवाई हो, जो इन गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं।
शिक्षा विभाग को जवाबदेह बनाया जाए, और मीडिया की भूमिका से पारदर्शिता लाई जाए।
आज घुग्घुस और उसके आसपास की शिक्षा व्यवस्था एक गहरे संकट से गुजर रही है। जहां शिक्षक व्यवसायी बन चुके हैं। यदि समय रहते इस भ्रष्ट व्यवस्था पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों की सोच, क्षमता और आत्मविश्वास पर पड़ेगा। अब जरूरत है – साहसी कदम उठाने की, ताकि शिक्षक फिर से आदर्श बनें, और शिक्षा फिर से सेवा मानी जाए, व्यापार नहीं।




