घुग्घुस नगर परिषद : जनादेश के बाद भी सत्ता की खींचतान, जनता के सवाल अधर में
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस (चंद्रपुर) | चंद्रपुर ज़िले के घुग्घुस शहर में 20 दिसंबर 2025 को संपन्न हुए नगर परिषद चुनाव और 21 दिसंबर को घोषित हुए चर्चात्मक नतीजों के बाद अब लोकतंत्र का असली इम्तिहान शुरू हो चुका है। जनता ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर अध्यक्ष समेत 22 पार्षदों को चुन लिया, लेकिन इसके बाद जिस तरह सत्ता की कुर्सी को लेकर खींचतान सामने आ रही है, उसने आम नागरिकों को निराश और आक्रोशित कर दिया है।
शहर के चौक-चौराहों, गलियों और चाय की दुकानों पर आज एक ही सवाल गूंज रहा है—चुने हुए प्रतिनिधि आखिर कब अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे? क्या चुनाव केवल सत्ता के खेल तक सीमित रहेंगे या जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान भी कभी प्राथमिकता बनेगा?
घुग्घुस शहर इस समय गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। स्वच्छता व्यवस्था चरमराई हुई है, जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं। नालियों की सफाई न होने से गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। पीने के पानी की अनियमित आपूर्ति से नागरिक त्रस्त हैं, वहीं जर्जर सड़कें और अधूरे विकास कार्य प्रशासनिक उदासीनता की गवाही दे रहे हैं।
चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे किए गए थे—शहर को स्वच्छ, सुंदर और सुविधायुक्त बनाने के। लेकिन परिणाम घोषित हुए कई दिन बीत जाने के बावजूद सत्ता गठन को लेकर चल रही जोड़-तोड़ और पर्दे के पीछे की राजनीति ने इन वादों को खोखला साबित करना शुरू कर दिया है।
नागरिकों का कहना है कि उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि अध्यक्ष की कुर्सी किसे मिले या सत्ता का समीकरण कैसे बने। उनकी अपेक्षा सिर्फ इतनी है कि चुने हुए प्रतिनिधि जल्द से जल्द नगर परिषद का कामकाज संभालें और रुके हुए विकास कार्यों को गति दें।
आज घुग्घुस की जनता यह सवाल पूछ रही है—क्या जनादेश केवल सत्ता की सौदेबाजी के लिए था? या फिर यह शहर के विकास और नागरिकों के बेहतर भविष्य की नींव रखने के लिए दिया गया था?
यदि जल्द ही नगर परिषद का गठन कर काम शुरू नहीं किया गया, तो यह साफ संदेश जाएगा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ से ज्यादा अहमियत सत्ता की राजनीति को दी जा रही है। घुग्घुस की जनता अब इंतज़ार नहीं, जवाब चाहती है।




