(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर — नगर परिषद चुनाव 2025 पर जारी किए गए अधिसूचना पत्र ने एक बार फिर शहर की राजनीति में उथल-पुथल मचा दी है। राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार 2 दिसंबर को होने वाला मतदान अब 20 दिसंबर तक आगे बढ़ा दिया गया है। वजह—न्यायालयीन आदेश, अपील और कार्यक्रम में “व्यत्यय”. लेकिन असली मार तो उन उम्मीदवारों पर पड़ रही है जिनका चुनाव खर्च नामांकन से लेकर आखिरी ‘ठप्पा’ तक लगभग खत्म हो चुका है।
उम्मीदवारों की जेब सूनी—अधिकारी चुप, अभियान ठप
चुनाव की तारीख आगे बढ़ते ही सभी प्रभागों के उम्मीदवार और अध्यक्ष पद के दावेदार चिंता में डूब गए हैं। लगातार प्रचार, वाहन, सभा, पोस्टर, पम्पलेट—सब पर पहले ही भारी खर्च हो चुका है। अब तारीख बढ़ने के साथ खर्च दोगुना होने की आशंका है, जबकि चुनाव आयोग की ओर से खर्च पर कोई स्पष्ट मार्गदर्शक सूचना तक जारी नहीं की गई है।
कुछ उम्मीदवारों ने तो साफ कहा है — “पार्टी से एक पैसा नहीं मिला, खर्च हम खुद ही उठा रहे हैं… अब तारीख बढ़ने से यह चुनाव आर्थिक रूप से असह्य हो गया है।”
कामगार उम्मीदवारों पर बड़ा सवाल—नौकरी बचाएं या चुनाव?
वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) के कई कर्मचारी इस चुनाव में उम्मीदवार बने हैं, लेकिन एक बड़ी कानूनी एवं प्रशासनिक उलझन अब खड़ी हो गई है। क्योंकि स्पष्ट नियम सामने नहीं आया है कि— क्या उन्हें चुनाव लड़ने से पहले इस्तीफ़ा देना चाहिए? या जीतने के बाद? अगर वे सरकारी/अर्धसरकारी नौकरी करते हैं, तो दोहरी भूमिका कैसे निभाएँगे? क्या यह सेवा नियमों का उल्लंघन माना जाएगा?
चुनाव स्थगन के बाद यह सवाल और उलझ गया है। न आयोग कुछ कह रहा है, न प्रशासन।
चुनाव आयोग की अधिसूचना में अस्पष्टता—जनता और उम्मीदवार दोनों परेशान
अधिसूचना में तारीखें बदल दी गईं, लेकिन उम्मीदवारों की सबसे बड़ी समस्या—खर्च, वैधता, आचारसंहिता, उम्मीदवारों की पात्रता—इन पर एक शब्द नहीं।
जिससे यह चुनाव “लोकशाही प्रक्रिया” कम और “अनिश्चितता की प्रयोगशाला” ज़्यादा लगता है।
अधिकारी खामोश, उम्मीदवार असमंजस में, जनता को समझ नहीं रहा कि सच क्या
नामांकन, छाननी, मतगणना की तारीखें अपडेट हो गईं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या बाकी है— “क्या यह चुनाव प्रशासनिक गफलत का उदाहरण है या जानबूझकर बनाई गई राजनीति?”
घुग्घुस में यह सवाल खुलेआम पूछा जाने लगा है।
कई लोग यह भी कह रहे हैं कि— “पहले स्थगन की अफवाहें, फिर अचानक नई अधिसूचना, और अब खर्च का बोझ… क्या चुनाव आयोग को जमीनी हकीकत की खबर तक नहीं?”
फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं—उम्मीदवारों के चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी
घुग्घुस नगर परिषद चुनाव की बदलती तारीखें और अस्पष्ट आदेशों ने उम्मीदवारों की पूरी रणनीति गड़बड़ा दी है। खर्च बढ़ रहा है, कामगार उम्मीदवार नियमों के जाल में फँसे हैं, और प्रशासन का रवैया अब भी “मौन” है। 20 दिसंबर को मतदान सही समय पर होगा या फिर एक और अधिसूचना? यह भी अब कोई गारंटी नहीं।
घुग्घुस में फिलहाल यही चर्चा है—
“यह चुनाव हो रहा है… या बस हो रहा है ऐसा दिखाया जा रहा है?”





