नई दिल्ली — वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय ने चुनाव आयोग को यह सुझाव दिया है कि आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर भी विचार किया जाए।
सिब्बल ने इसे मात्र तकनीकी प्रक्रिया न मानते हुए, इसके पीछे एक “राष्ट्रीय दृष्टिकोण” की ओर इशारा किया जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य भारत में बहुसंख्यकों का स्थायी राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है।
“यह एक पायलट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि बहुसंख्यक शासन की नींव रखने की कोशिश है,” – कपिल सिब्बल
उन्होंने कहा कि लाखों भारतीय नागरिकों — विशेषकर आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों — के पास जन्म प्रमाण पत्र जैसी जरूरी पहचान नहीं है। ऐसे में यदि पुनरीक्षण प्रक्रिया में केवल जन्म प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाया गया, तो यह बड़ी संख्या में नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर कर सकता है।
कपिल सिब्बल ने आगे कहा:
“आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक — इन सबके पास कागज नहीं हैं। सरकार ये जानती है, और फिर भी इस तरह की कवायद शुरू कर रही है… यह सब एक बड़ी राजनीतिक योजना का हिस्सा है।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और चुनाव आयोग संवैधानिक मूल्यों से भटकते जा रहे हैं और लोकतंत्र की बुनियाद — निष्पक्ष मतदान — को कमजोर कर रहे हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे क्या निर्णय देता है और क्या केंद्र सरकार इस पर पुनर्विचार करती है।
यह मुद्दा न केवल मतदाता पहचान की प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर किस तरह की बहसें अभी बाकी हैं।




